2019 किसका! पंडित दीनदयाल के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का या गाँधीवादी का!! - Kashi Patrika

2019 किसका! पंडित दीनदयाल के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का या गाँधीवादी का!!


धीरे-धीरे 26 मई के बाद मोदी सरकार अपने कार्यकाल के पांचवें साल में प्रवेश कर गई। कही पहले जैसा शोर-शराबा दिखाई नहीं पड़ता। न तो लोगों में मोदी की राजनीतिक कुशलता के प्रति उत्साह ही बचा हैं और न ही लोगों को मोदी के क्रियाकलापों में दिलचस्पी ही बाकी है।

किसी चीज की अधिकता कभी-कभी उसके हास का कारण बन जाती हैं। मोदी सरकार के साथ भी ऐसा ही हो रहा हैं। हर योजना के प्रचार पर जम कर पैसे बहाना और उसका श्रेय केवल प्रधानमंत्री मोदी को देना, आज बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण बन गई हैं। लोगों की आम धारणा प्रबल होती जा रही हैं कि ये वादों की सरकार भी नहीं वरण जुमलों की सरकार हैं। जहाँ प्रचार के माध्यम से लोगों को विश्वास दिलाया जाता हैं कि विकास हो रहा हैं। 

नोटबंदी के बाद
याद करिये 2016 का साल जब सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी कर मोदी सरकार हर खास-ओ-आम की जुबान पर बढ़ चढ़ कर बोल रही थी। बैंकों के सामने लम्बी लम्बी कतारों में लगे लोग अपने ही पैसे के लिए बैंकों का मुँह देख रहे थे पर दबी जुबान में सब मोदी की तारीफ कर रहे थे। लोगों में उत्सुकता थी कि इस नोटबंदी के आगे क्या ? फिर वो दिन आया जब मोदी ने एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए कुछ ऐसा बोला जो लोगों के मन को अंदर तक आंदोलित कर गया। हर एक के खाते में 10 लाख रुपए। 
जी हाँ, यही वो फिसलन थी जिसपर मोदी सरकार नीचे की और फिसलती चली गई। जानकारों का कहना है कि यही मोदी के राजनीतिक ढलान का कारण हैं। इसे अमित शाह ने राजनीतिक भाषण करार दिया। और लोगों के मन पर मोदी की जो छाप बनी थी वो धुलती चली गई। 10 लाख एक जुमला सबित हुआ। 

संस्कृति के भरोसे पेट नहीं भरता
अपने 90 से ज्यादा विदेश दौरे में मोदी जहाँ भी गए उन्होंने एक बड़ी भीड़ के साथ भारतीय संस्कृति का प्रचार करना जारी रखा। मोदी के विदेश दौरों के परिणाम से ज्यादा लोगों में सांस्कृतिक प्रसार का जोश दिखता था। लोगों का कहना हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस सरकार ने भारतीय संस्कृति को बाजार का सामान बना दिया हैं, जिसकी नुमाईश सरकार केवल अपने खजाने और वोट बैंक को भरने के लिए कर रही हैं। राम के देश में रेप की घटनाओं और करप्शन पर लगाम न लगना तो यही दिखाता हैं। 
वैसे भी, संस्कृति से पेट नहीं भरता! बेरोजगारी से परेशान युवाओं का कहना है कि भरपेट हर बात अच्छी लगती है, लेकिन सरकार सिर्फ अच्छी बातें ही करती है। रोजगार में “अच्छे दिन” दूर का ढोल लग रहा है, जिस पर सरकार स्वरोजगार की बात करके मरहम लगा रही है। जमीनी परिणाम कुछ नहीं निकल रहा है। कहीं कुछ काम हो, तब तो लोग रोजगार या स्वरोजगार करें। 

एकजुट विपक्ष पड़ रहा भारी
उधर, गाँधीवादी विचारधारा पर चल रही कांग्रेस ने सभी दलों को जोड़कर पहले कर्नाटक हथिया लिया और बाकी जगहों को समझने के लिए बुधवार को आए उपचुनाव परिणाम काफी हैं। वर्तमान में लंबे समय बाद  गाँधीवादी विचारधारा के जरिए कांग्रेस सभी राजनीतिक दलों को  इकठ्ठा कर भाजपा के सामने मजबूत दिख रही है। और उसे कई मोर्चों पर पटखनी भी दे रही है। ऐसे में, केंद्र सरकार के 5 वें साल के क्रियाकलापों को देखना दिलचस्प होगा।
- सिद्धार्थ सिंह

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