बेबाक हस्तक्षेप - Kashi Patrika

बेबाक हस्तक्षेप

कैराना में भाजपा को मिली पटखनी को लोकसभा से जोड़कर देखना तर्कगत भले न हो, क्योंकि अभी कई समीकरण बनेंगे, बिगड़ेंगे। फिर विपक्षी मंच पर धुर विरोधियों की एकता कितनी दूर तक कदमताल करेगी, जैसे यक्ष प्रश्न हैं? किंतु यहां बात सिर्फ एक लोकसभा सीट या आगामी लोकसभा चुनाव की नहीं, बल्कि बात उस राजनीतिक समीकरण के जिंदा होने की है, जो 2013 के मुजफ्फरनगर, शामली और कैराना के दंगों में दरक गया था। इलाके की राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जाति जाट और संख्या में भारी पड़ने वाले मुसलमानों के बीच एक बड़ी खाई पैदा हो गई थी। जिसके नतीजे 2014 के लोकसभा चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनावों के नतीजों में देखने को मिला। फायदा भाजपा की झोली में गया।

समझने की कोशिश करें तो, यह जनादेश भाजपा के विरुद्ध नहीं है, सिर्फ आम जन की अनदेखी के विरोध में वोट पड़े। आम जन की समस्याएं, दुश्वारियां और जीवन एक सा होता है, फिर आपसी दूरियां कब तक बनी रहती! फलस्वरूप पुराने गिले-शिकवे भूलकर जनता एक हो गई। चुनाव के दौरान बना खेले गए “गन्ना” और “जिन्ना” कार्ड में से लोगों ने गन्ना को चुना, इसलिए परिणामों को एक दल विशेष से जोड़कर देखने की बजाय यह समझने की कोशिश करनी होगी कि जनता से झूठे वादे कर उसे बहकाना-फुसलाना आसान नहीं है। कैराना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। भाजपा ने कैराना में सांसदों, विधायकों और मंत्रियों की फौज उतार दी थी, लेकिन उनका पूरा एजेंडा दंगों में फंसे लोगों की मदद के दावे और 2013 में जाटों के खिलाफ हुई प्रशासनिक ज्यादतियों पर ही फोकस रहा। दूसरा बड़ा दावा कानून-व्यवस्था में सुधार का था। इसके अलावा जिन्ना विवाद से लेकर आतंकवाद, पाकिस्तान, कश्मीर, पलायन जैसे मुद्दों को उठाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की खूब कोशिशें की गईं। जाट बहुल गांवों में रालोद का विरोध नहीं कर पा रहे थे, तो रालोद प्रत्याशी के मुस्लिम होने और सपा से आने का मुद्दा उठाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद सहारनपुर के अंबेहटा और शामली में दो चुनावी सभाएं की थी। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मोर्य ने लगातार यहां प्रचार किया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार समाप्त होने के अगले दिन और मतदान के एक दिन पहले कैराना से सटे बागपत में ईस्टर्न पैरिफरल एक्सप्रैसवे का उद्घाटन किया और वहां पर रैली को संबोधित कर गन्ना मूल्य भुगतान की सरकार की कोशिश का प्रमुखता से जिक्र भी किया।

असल में ध्रुवीकरण पर केंद्रित भाजपा की चुनावी रणनीति में मुद्दे गायब हो गये। यहां पर गन्ना मूल्य भुगतान में देरी सबसे बड़ा मुद्दा बन रहा था, जिससे सभी जातियों के किसान नाराज थे। कैराना सीट में पड़ने वाली पांच चीनी मिलों पर ही करीब 800 करोड़ रुपये का बकाया भुगतना था। मतदाता इस पर हर जगह सवाल उठा रहे थे, जिसका जवाब भाजपा के नेता और मंत्री नहीं दे पा रहे थे। मुद्दों और दुश्मनी को ताक पर रख यहां की जनता “आम” बन गई और उपचुनाव के दिन पुलिस-प्रशासन के रवैए, बड़े पैमाने पर वीवीपैट के बंद होने को दरकिनार कर मतदाताओं ने देर तक मतदान किया। 73 पोलिंग बूथों पर हुए दोबारा मतदान में भी हिस्सेदारी की। जाहिर है जाट-मुस्लिम और दलित मतों के सामाजिक समीरकण ने भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया। फूलपुर और गोरखपुर के बाद कैराना और नूरपुर की हार भाजपा के लिए बड़ा सबक है।

कुल मिलाकर, कैराना, नूरपुर...जनता ने साफ संकेत दिया है कि लोकतंत्र में वो ही सर्वोच्च है और उसकी अनदेखी कर कोई भी सियासत नहीं कर सकता। इस जनादेश को दल विशेष के परिपेक्ष में देखने की बजाय सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा कि जनता का भरोसा जीतने के लिए उसके लिए काम करना होगा, उसकी समस्याओं को दूर करना होगा और उसे साथ लेकर चलना होगा।
- संपादकीय




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