किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी।
हजार बार ज़माना इधर से गुजरा
नई नई है मगर कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी।
खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नजर
दराज़ होके फसाना है मुख्तसर फिर भी।
झपक रही हैं जमान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है काफ्ला आमादा-ए-सफर फिर भी।
पलट रहे हैं गरीबुल वतन, पलटना था
वोः कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर, फिर भी।
तेरी निगाह से बचने मैं उम्र गुजरी है
उतर गया रग-ए-जान मैं ये नश्तर फिर भी।
- फिराक गोरखपुरी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी।
हजार बार ज़माना इधर से गुजरा
नई नई है मगर कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी।
खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नजर
दराज़ होके फसाना है मुख्तसर फिर भी।
झपक रही हैं जमान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है काफ्ला आमादा-ए-सफर फिर भी।
पलट रहे हैं गरीबुल वतन, पलटना था
वोः कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर, फिर भी।
तेरी निगाह से बचने मैं उम्र गुजरी है
उतर गया रग-ए-जान मैं ये नश्तर फिर भी।
- फिराक गोरखपुरी



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