ध्यान का मतलब है होशपूर्ण होना/ओशो - Kashi Patrika

ध्यान का मतलब है होशपूर्ण होना/ओशो

लोग अकसर ध्यान में रुचि लेते हैं, तो विचारों को रोकने का प्रयास करते हैं। यह संभव नहीं है, क्योंकि ध्यान भी एक विचार है। अतः खुद को रणभूमि मत बनाओ। होशपूर्ण बनो...
तुम्हारे विचारों की कोई जड़ें नहीं हैं, उनका कोई घर नहीं है; वे बादलों की तरह भटकते हैं। इसलिए तुम्हें उनके साथ संघर्ष नहीं करना है, तुम्हें उनके विपरीत नहीं होना है, तुम्हें उन्हें रोकने का भी प्रयास नहीं करना है।

यह तुम्हारे भीतर गहरी समझ बन जानी चाहिए, क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति ध्यान में रुचि लेना प्रारंभ करता है वह विचार को रोकने का प्रयास करने लगता है। और यदि तुम विचारों को रोकने का प्रयास करते हो, वे कभी भी नहीं रुकेंगे, क्योंकि रोकने का प्रयास भी विचार ही है, ध्यान करने का प्रयास भी विचार है, बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाने का प्रयास भी विचार है। और तुम विचार के द्वारा विचार को कैसे रोक सकते हो? तुम मन को कैसे एक और मन को पैदा करके रोक सकते हो? तब तुम दूसरे को पकड़ लोगे। और यह होता ही चला जाएगा; तब इसका कोई अंत नहीं होगा। संघर्ष मत करो--क्योंकि कौन लड़ेगा? तुम हो कौन? विचार मात्र, इसलिए एक विचार का दूसरे विचार से संघर्ष करवा कर स्वयं को रणभूमि मत बनाओ। बजाय इसके, साक्षी बनो, तुम बस विचारों को तैरते हुए देखो। वे रुक जाते हैं, पर तुम्हारे रोकने से नहीं रुकते। तुम्हारे अधिक होशपूर्ण होने से वे रुकते हैं, उन्हें रोकने के तुम्हारे प्रयास से नहीं।

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