'अमृत-वाणी''- संदेह की जेल... - Kashi Patrika

'अमृत-वाणी''- संदेह की जेल...


लड़की की शादी ढूंढी जा रही थी। माता-पिता हर संभव प्रयास कर रहे थे। दूर-दराज़ के रिश्ते-नाते में भी सुयोग्य वर मिलने पर संदेश भेजने को कहा गया था। कुच्छ रिश्ते मिल भी रहे थे पर बात बन न पा रही थी। लकड़ी गृह कार्य में तो दक्ष थी पर उसमें एक कमी भी  थी, उसके आँख की रौशनी कुच्छ कम थी। हालांकि यह बात माता-पिता छुपा भी देते पर उन्होंने ऐसा किया नहीं। इस बात को रखते ही रिश्ते पक्के न हो पाते। 



समय बीतता जा रहा था,माता-पिता की चिंता भी बढ़ती जा रही थी। ऐसे ही एक दिन पंडित जी आये औऱ एक लड़के की कुंडली भी साथ लाये थे। पंडित जी ने घर-वार के बारे में जब बताया तो लड़के की सरकारी नौकरी देख सबने हामी भर दी। शादी होनी थी हो गई। इस बार लड़की के कमी को उजागर नहीं किया गया। 

अब जब लड़की ससुराल पहुँची तो सुघड़ होने के कारण सबका मन जितने में उसको देर न लगी। सब ठीक था के एक रोज़ उसको पति ने चश्मा लगाये देख लिया। पूछने पर लड़की ने अपनी समस्या बताई। पति को बात छुपाये जाने की नाराज़गी रहने लगी। जब बात सास-ससुर तक़ पहुँची तो औऱ बढ़ गयी। लड़की के माता पिता को कोसा जाने लगा। पंडित जी को बुलावा गया उन्होंने ग़लती माता-पिता की बता कर चलते बने। माता-पिता को बुलावा गया। उन्होंने हाथ- पैर जोड़ कर काम चला लिया। लड़की अब भी सबकी सेवा में लगी रहती दिन बीतते गए पर सालों बाद भी उसके घरवालों के द्वारा किया छल ही प्रमुख रहा, उसकी मेहनत दूसरे पायदान पर ही आती। पति को उसके कई रिश्ते टूटने की ख़बर थी, अब उसको यह भी संदेह रहता के बात नेत्र ज्योति से कही बढ़ कर तो न थी।


ठीक ही कहा गया है, हर हाल में संदेह की स्थिति से बचिए। भले ही एक बार आप किसी मजबूरी में ही छलते हो पर मन में जो 'शंका' का बीज डाल दिया आपने, वह अँकुरित हो कर, बरगद का वृक्ष बन जाता है। शाखाएँ, जड़ सब अनंत काल तक डटी रहतीं है। हृदय के खटास को पोषित करतीं रहती है। संदेह की स्थिति से बच कर रहिये।

शुभरात्रि

अदिति


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