घर से कैप्सूल का सफर
स्वच्छंद विचरण करने वाले मनुष्य ने सामाजिक परिवेश के निर्माण के बाद बड़े पैमाने पर घरों का निर्माण किया। पहले ये घर संयुक्त परिवार को प्रदर्शित करते थे फिर एकल परिवार का जमाना आया। अब समय है एकला चलों रे। जी हाँ सत्य है जापान के ओसाका में ऐसे ही कमरों का निर्माण हो रहा है जिसमे केवल एक बिस्तर भर के बराबर जगह हैं इस छोटी सी जगह में आप की सुख सुविधाओं की हर चीज मौजूद है। १९७९ के दौर में जापान में इस तरह के कैप्सूल होटल का प्रचलन शुरू हुआ। माना जाता हैं कि आर्किटेक्ट किशो कुरोकवा ने सबसे पहले इस तरह के कैप्सूल होटल का निर्माण किया। इन कैप्सूल होटल में रुकने की कीमत ३० से ५० $ पर नाईट हैं।
स्वच्छंद विचरण करने वाले मनुष्य ने सामाजिक परिवेश के निर्माण के बाद बड़े पैमाने पर घरों का निर्माण किया। पहले ये घर संयुक्त परिवार को प्रदर्शित करते थे फिर एकल परिवार का जमाना आया। अब समय है एकला चलों रे। जी हाँ सत्य है जापान के ओसाका में ऐसे ही कमरों का निर्माण हो रहा है जिसमे केवल एक बिस्तर भर के बराबर जगह हैं इस छोटी सी जगह में आप की सुख सुविधाओं की हर चीज मौजूद है। १९७९ के दौर में जापान में इस तरह के कैप्सूल होटल का प्रचलन शुरू हुआ। माना जाता हैं कि आर्किटेक्ट किशो कुरोकवा ने सबसे पहले इस तरह के कैप्सूल होटल का निर्माण किया। इन कैप्सूल होटल में रुकने की कीमत ३० से ५० $ पर नाईट हैं।
कंप्यूटर से सुपर ह्यूमन का सफर

ज्ञान-विज्ञान की खोज का सिलसिला निरंतर बढ़ता आ रहा है। वैज्ञानिकों ने नई नई तकनीकी का ईजाद कर बहुत से रोजमर्रा के कठिन कामों को सरल बना दिया हैं। आज कंप्यूटर लगभग सभी की जीवन की दिनचर्या का अंग बन चूका है। अगर वैज्ञानिकों की माने तो वो समय अब दूर नहीं जब मानव मस्तिष्क में ही कंप्यूटर प्रत्यारोपित कर दिया जाएगा। ४४ वर्षीय यूएस के वैज्ञानिक डॉ एरिक लूथरड का मानना है कि १० से १५ सालों में ऐसे प्रयोग आम हो जाएगे जब आम लोगों के मस्तिष्क में एक चिप डाली जाएगी जिससे उनके मस्तिष्क का सम्पूर्ण भाग जाएगा। ये मनुष्य इलेक्ट्रॉनिक टेलीपैथी से मनुष्यों और कम्प्यूटर से बात भी कर पाएंगे।
अमूमन भारत में लम्बे समय से गावों में मिट्टी से हाथ धोने का रिवाज़ रहा हैं। फिर जमाना आया साबुन से हाथ धोने का। लम्बे समय तक इस बात पे बहस होती रही कि मिट्टी से हाथ धोना ज्यादा साफ़ है या साबुन ने। इन बहसों के बीच समय बदला और अब समय आ गया हैं हैण्ड सेनेटाइजर का। आप यह लोशन बस अपने हाथों में लगाइये और बस। पानी तक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं हैं। अभी इन हैण्ड सेनेटाइजरस की कीमत बाजार में थोड़ी ज्यादा हैं जल्द है ये हैण्ड सेनेटाइजर हर इंसान के रोजमर्रा की जरुरत की चीज बन जायेंगे।
गोंद-गुड़ से एअर वैक्यूम जोड़ तक का सफर

आप को याद होगा या आप अपने बड़े बुजुर्गों से पूछेंगें तो वो आप को विस्तार से बताएँगे की पहले कैसे किसी चीज को चिपकाने के लिए वो लेइ का इस्तेमाल करते थे। ये लेइ या तो चिपकने वाले पदार्थों को गर्म कर बनाई जाती थी। फिर जमाना आया बाजार में कृतिम रूप से तैयार इन गोंदों का जिसने आपके लेइ बनाने के झंझट को ख़त्म कर दिया। अब समय आ गया हैं लेजर लाईट और वैक्यूम जोड़ो का।


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