'आपकी गृहस्थी' : प्रतिस्पर्द्धा छोड़ कभी-कभी पराजित होने में कोई बुराई नहीं।... - Kashi Patrika

'आपकी गृहस्थी' : प्रतिस्पर्द्धा छोड़ कभी-कभी पराजित होने में कोई बुराई नहीं।...


बस में सफ़र कतरे हुए दो बृद्ध महिलाओं की वार्तालाप सुन रही थी। दोनों ही उम्र के इस पड़ाव पर  सास की भूमिका भी निभा रहीं थी। उनमें से एक कह  रहीं थी 'बहु तो बेटे के साथ ही उसके काम के शहर में रहती है छुट्टियों में आती है तो भी रसोई में रहने की जगह आधे समय घर से बाहर ही होती है, बाज़ार के चक्कर यहां भी लगाती रहती है।' 


दूसरी महिला बड़ी देर से चुप ही थीं, बोलीं, 'बहन मन उदास मत करो, इसमें बहु का नहीं उसकी उमर का ज़्यादा दोष है। कुच्च बातें उमर ढलने पर ही समझ आतीं हैं। उसकी उमर में हम भी तो यही चाहते थे। बस वो अपनी दिल की करती है और हम दुनियां की करते-करते बूढ़े हो गये।' तभी पहली महिका बोलीं, ' औऱ आज भी दुनियां की ही कर रहे हैं' फ़िर दोनो हँसने लगीं। 

टिप्स: बहुओं को थोड़ा इस ओर ध्यान देना ही चाहिए। सासु माँ से मिक कर गप्पे लगाना अग़र आप सीख लेतीं हैं तब उनके साथ किचन साझा करना बहुत ही आसान काम हो जाएगा। मिलनसार बनिये , हँसते- मुसकराते  गृहस्थी में थोड़ा ख़ुद को बदलिए। प्रतिस्पर्द्धा छोड़ कभी-कभी पराजित होने में कोई बुराई नहीं।

अदिति

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