जी हाँ, साहब गोमुख से वाराणसी तक हमारी ही सरकार हैं, कांग्रेस मुक्त सरकार।बारिश भी हमारे भरोसे ही होती हैं। इस बार हम वैसी जगहों पर बारिश कराएंगे, जहाँ से गंगा में जल जा सके। 2019 से पहले हमने गंगा सफाई का जो अभियान चलाया है, इस बारिश में वो सब धुल जाएगा।
एक अनासक्त वक्ता लगातार ये वादे किए जा रहा था और सुनने वाले चकित थे। लगता है इस पर ईश्वर की कृपा है, साक्षात् ब्रह्म स्वरूप है या तो देवदूत है, जिसे ईश्वर ने हमें तारने के लिए भेजा हैं। लोग इक्कठ्ठे होते जा रहे थे और वक्ता उत्साहित।
उसने फिर डुगडुगी बजाने के अंदाज में कहना शुरू किया। हर 'हाथ रोजगार’अबकी बार। फिर जुमला बदला और कहा, ‘सबका साथ सबका विकास’। लोग तालियों पर तालिया पीटे जा रहे थे। सभी मंत्रमुग्ध थे और होते भी क्यों नहीं! पहली बार ऐसा वक्ता जो सामने आया था, साक्षात् ब्रह्म स्वरूप। सभी जानते थे इस अनासक्त वक्ता को, हर रोज पेपर में इसके विज्ञापन जो आते थे। रोज-रोज, बार-बार, अबकी बार हमारी सरकार।
कुछ देर के खेल-तमाशे और गाजे-बाजे के बाद सभी का मन ऊबने लगा। तमाशबीन लोग समझ चुके थे कि ये सर्कस का कोई रिंग मास्टर है, जिसको चाभुक से डराने का कुशल प्रशिक्षण दिया गया हैं। ये अनासक्त वक्ता बस वही किए जा रहा था। ‘बार-बार लगातार हमारी सरकार’ जैसे कोई टेप रिकॉर्डर हो। एक बार बटन दब गया तो या तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाएंगे या परेशान। बीच का गाँधीजी वाला रास्ता नहीं था कि गाँधी ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।’
वक्ता ने अपने भाषण के शुरू में ही साफ कर दिया था, “मुझे किसी ने नहीं बुलाया है और न मैं किसी के कहने पर यहाँ आया हूँ। मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया हैं।” अब मामला ठहरा पुत्र और माँ का, तो किस नामुराद की हिम्मत थी कि हंटर वाले वक्ता से उसके भाषण में किए वादों के विषय में पूछता। सभी मूक दर्शक बन देखने को बाध्य थे। अचानक भीड़ में किसी ने पूछा भाई साहब आप तो बड़बोले मालूम होते हैं। वक्ता के संगी-साथियों ने भीड़ में खड़े विरोधियों को पाकिस्तानी कहना शुरू कर दिया। कहा, अगर हमारे ब्रह्म स्वरूप वक्ता को कोई कुछ भी बोलेगा, तो हम उसे पकिस्तान भेज देंगें।
मामला बढ़ता देख और भीड़ जुट गई। ब्रह्म स्वरूप वक्ता फिर चिल्लाया,' बार बार हमारी सरकार।' अच्छे दिन आने वाले हैं, हम लाने वाले हैं। इस प्रकार जो मजमे का सिलसिला था वो बदस्तूर जारी है। माँ गंगा टकटकी बांधे अपने भीष्म पुत्र की राह देख रही हैं कि कब वो उन्हें कलियुग के अत्याचारी शासकों से मुक्त कराएगा।
भीड़ में समझदार लोग अपनी रोजी-रोटी के हिसाब-किताब में लग गए हैं। इस महंगाई और बेरोजगारी ने सबकी कमर तोड़ दी हैं। लाचारी का आलम ऐसा है कि अगर ब्रह्म स्वरूप वक्ता को बताया तो वह फिर मुद्दा भुना लेगा। तो बोलो हर-हर महादेव! अबकी बार फिर विज्ञापन वाली सरकार!!
■ सिद्धार्थ सिंह



No comments:
Post a Comment