जय शंकर दुखहरम्, श्री केदार नमाम्यहम् - Kashi Patrika

जय शंकर दुखहरम्, श्री केदार नमाम्यहम्

मटरगश्ती॥  मन में बाबा भोले के दर्शन की धुन एवं होठों पर “हर हर महादेव” लिए भक्तों की टोली हिमालय की कठिन डगर और मौसम की विषमताओं को पार कर “केदारनाथ” के द्वार पहुंच जाती है। तभी तो, पट खुलते ही 25 हजार भक्तों ने बाबा का दर्शन-पूजन किया और मौसम की दुश्वारियों को पार कर एक माह में 4.80 लाख श्रद्धालुओं ने बाबा केदारनाथ के दरबार में मत्था टेका। केदारनाथ के दर्शनार्थियों की यह संख्या अपने आप में रिकॉर्ड है। बीते वर्ष पूरे सीजन में 4.71 लाख श्राद्धलु जुटे थे। माना जाता है कि “केदारनाथ” के दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।


उत्तराखंड में अवस्थित चार धाम में यमुनोत्री और गंगोत्री के बाद देवाधिदेव महादेव “केदारनाथ” के दर्शन की परंपरा है। उत्तरांचल के रूद्रप्रयाग जिले में हिमालय की गोद में बसा “केदारनाथ” बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदम्देश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए, इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को “पंचकेदार” भी कहा जाता है।

चौरीबारी हिमनद के कुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप पर्वतराज हिमालय के केदार श्रृंग पर स्थित विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (3,562 मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे 100 वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था, जिसका जीर्णोद्धार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने करवाया था। शीतकाल में केदारघाटी बर्फ से ढंकी रहती है, इसलिए मंदिर के कपाट अप्रैल (वैशाखी) से नवंबर के बीच खुले रहते हैं। मंदिर बंद रहने की स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को ‘उखीमठ’ में लाया जाता है।

पहाड़ियों से घिरा भव्य मंदिर

तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है, जो कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग की हैं। मंदिर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। मान्यताओं के अनुसार मंदिर का गर्भगृह काफी प्राचीन है, जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है। केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड।
केदारनाथ मंदिर न सिर्फ तीन तरफ पहाड़ हैं, बल्कि यहां पांच नदियों का संगम भी है- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा, लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है।


ज्योतिर्लिंग की स्थापना और मंदिर

यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना को लेकर कथा प्रचलित है कि हिमालय के केदार पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर दिया।
कत्यूरी शैली निर्मित यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है। इसका निर्माणकाल 10वीं-12वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं।


पांडव और केदारधाम

ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने के बाद पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन देवाधिदेव महादेव पांडवों से रुष्ट थे। पांडव जब भगवान शिव के दर्शन के लिए काशी पहुंचे, तो वहां उन्हें शिव नहीँ मिले, तब पांडव उन्हें ढूंढते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। किंतु, देवाधिदेव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, सो वे शिव का पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। यह देखकर भगवान शिव बैल का रूप धारण करके पशुओं के झुंड में छिप गए। पांडवों को संदेह हो गया था कि भगवान शिव पशुओं के झुण्ड में उपस्थित हैं, इसलिए भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैलाकर रास्ता बना दिया।

अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर बैल का रूप धारण किये भगवान शिव पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। तब भीम पूरी ताकत से बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगे, तब भीम ने बैल का पीठ का भाग पकड़ लिया। और भगवान शिव भी पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तुरंत दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ धाम में पूजे जाते हैं।

बैल के पीठ रूपी पिंड की पूजा

पांडवों ने बैल के रूप में भगवान शिव का पीठ पकड़ा था, सो श्री केदारनाथ मंदिर में शिवशंभू बैल की पीठ की आकृति के पिंड के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घारे अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। केदारनाथ के मंदिर पर 20 द्वार की चट्टी है। सबसे ऊपर सुनहरा कलश है। मंदिर के ठीक मध्य में केदारनाथ की स्वयंभू मूर्ति है। उसी में भैंसे के पिछले धड़ की आकृति भी है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान को घृत अर्पित कर बाँह भरकर मिलते हैं, मूर्ति चार हाथ लम्बी और डेढ़ हाथ मोटी है। इसके चारों ओर द्रौपदी सहित पांचो पांडव की मूर्तियां हैं। इसके मध्य में पीतल का छोटा नंदी है और बाहर दक्षिण की ओर बड़ा नंदी है। द्वार के दोनों ओर दो द्वारपाल हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जा सकता है।

संध्या को गर्भगृह में प्रवेश वर्जित

प्रात:काल शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। प्रातः 6:00 बजे श्रद्धालु के लिए खुलता है। इस समय गर्भगृह में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं। दोपहर तीन से पाँच बजे तक विशेष पूजा होती है और उसके बाद विश्राम के लिए बन्द कर दिया जाता है।
पुन: शाम 5 बजे जनता के दर्शन हेतु मन्दिर खोला जाता है।
पाँच मुख वाली भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके 7:30 बजे से 8:30 बजे तक नियमित आरती होती है। इस समय भक्तगण दूर से देवाधिदेव शिव के दर्शन कर सकते हैं। रात्रि 8:30 बजे केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर बन्द कर दिया जाता है।

पहुंचने की कठिन डगर

पहाड़ी के कारण मौसम और रास्ता दोनों दुश्वारियों से भरा है। हालांकि, सरकार की कोशिशों से मुश्किल आसान हुई है। केदारनाथ पहुंचने के दो मार्ग हैं। पहला 14 किमी लंबा पक्का पैदल मार्ग है, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, 20 किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और 14किलोमीटर की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुजरनेवाले पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है। गौरीकुंड उत्तराखंड के प्रमुख स्थानों जैसे ऋषिकेश, हरिद्वार, देहरादून इत्यादि से जुड़ा हुआ है। दूसरा मार्ग है हवाई मार्ग। अभी हाल ही में राज्य सरकार द्वारा अगस्त्यमुनि और फाटा से केदारनाथ के लिये पवन हंस नाम से हेलीकाप्टर सेवा आरंभ की है और इनका किराया उचित है।
सोनी सिंह

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