काशी सत्संग: "घर जाकर बोल दूंगा" - Kashi Patrika

काशी सत्संग: "घर जाकर बोल दूंगा"

भक्तिर्देवे मतिर्धर्मे, शक्तिस्त्यागे रतिः श्रुतौ l 
दया सर्वेषु भूतेषु, स्यान्मे जन्मनि जन्मनि ll 

भावार्थ :- हमारी प्रार्थना का मुख्य बिंदु यहीं हो कि प्रत्येक जन्म में मेरी परमात्मा में भक्ति हो, धर्म में मति हो, त्याग-दान देने की शक्ति हो, वेद के प्रति प्रेम हो और सभी प्राणियों के प्रति दया की भावना हो।


पुराने जमाने की बात है। किसी गांव में एक सेठ रहेता था। उसका नाम था नाथालाल सेठ। वो जब भी गांव के बाजार से निकलता था, तब लोग उसे नमस्ते या सलाम करते थे, वो उसके जवाब में मुस्कुराकर अपना सिर हिला देता था और बहुत धीरे से बोलता था कि "घर जाकर बोल दूंगा"।

एक बार किसी परिचित व्यक्ति ने सेठ को यह बोलते हुए सुन लिया, तो उसने कौतूहलवश सेठ को पूछ लिया कि सेठजी आप ऐसा क्यों बोलते हो कि "घर जाकर बोल दूंगा"।

तब सेठ ने उस व्यक्ति को कहा, "मैं पहले धनवान नहीं था, उस समय लोग मुझे 'नाथू' कहकर बुलाते थे और आज के समय में धनवान हूं, तो लोग मुझे 'नाथालाल सेठ' कहकर बुलाते हैं। यह इज्जत मुझे नहीं धन को दे रहे हैं, इसलिए में रोज घर जाकर तिजोरी खोलकर लक्ष्मीजी (धन) को ये बता देता हूं कि आज आपको कितने लोगों ने नमस्ते या सलाम किया। इससे मेरे मन में अभिमान या गलतफहमी नहीं आती कि लोग मुझे मान या इज्जत दे रहे हैं।

"भगवद गीता" में लिखा है:- 
'निराश मत होना, कमजोर तुम्हारा समय है "तुम" नहीं।
जीवन में 'बुरे दिन' से सामना हो, तो 'हौसला' रखना-  क्योंकि 'दिन' बुरा था, 'जीवन' नहीं।।
ऊं तत्सत...

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