आराधना और मनुष्य का संगम ही तो हैं जो तुम्हे मृत्य के पार जीवन जीने की ऊर्जा प्रदान करता हैं, तो संकोच कैसा उसकी शरण में जाने से। आत्ममंथन और पारब्रह्म का ज्ञान तो तुम्हें वैसे भी प्राप्त हैं बस जीवन की उथल-पुथल के बीच स्वयं का मार्ग ही तो ढूंढना है, जो उतना ही आसान है जितनी की यह प्रकृति तो आगे बढ़ो...
यह जीवन वैसे भी नश्वर हैं चाहे तुम लाख कोशिश कर संचय करते जाओ। पर बचता कुछ भी नहीं हैं बस उस बचाव का रास्ता बदल जाता हैं। तुमने जिनसे संचय किया हैं वो भी अपना अंश दान कर रहे हैं और जिसने अधिक दिया हैं वो भी तुमसे उतना ले ही लेंगे। तो संचय भी व्यर्थ ही साबित होगा। बस फर्क हैं तुम्हारी सोच का जिसमे तुम भूल जाते हों उस परमसत्य की उपस्थिति जिसमे सबकुछ समाहित हैं। वो ही बटवारा करता हैं कि किसे कितना देना हैं और किससे कितना लेना हैं।
आगे बढ़ने की सिमा वो खींचना भूल गया हैं जिसमे उसने मृत्यु के बाद भी अनवरत कदम बढ़ाने की स्वतंत्रता दी हैं तो अपने मदहोश जीवन में जितने रंग भर रहे हो उसे मृत्यु के बाद भी तुम्हे ही भरना हैं बस उसके नियम और कायदे अलग होंगे। हिसाब भी जो अब तक तुम्हारे हाथ में था वो कोई और कर रहा होगा। तो बस ध्यान रखो की जीवन केवल अर्ध सत्य की तरह तुम्हे रोक न दे।
कम से कम शास्त्र तो यही कहते हैं फिर अगर तुम्हारा अस्तित्व शास्त्र से बड़ा हुआ तो तुम विजेता की तरह पुंजे जाओगे। यह भी सत्य हैं और यह भी तुम्हे पहले से ज्ञात हैं। तो आगे बढ़ो और हर क्षण यह अंगीकार करों की तुम्हारा अस्तित्व मृत्यु के परे भी हैं। जो तुम्हे नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
ऊं तत्सत...



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