केंद्र और राज्य सरकारे चाहे समग्र विकास का कितना भी दम भर ले पर वास्तविक स्थिति उससे कही ज्यादा गंभीर और चिंतनीय होती जा रही हैं। आज भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही हैं, बेरोजगारी के आकड़े आसमान छू रहे है, और बढ़ती महगाई और नित्य बदलते नियमों की वजह से मध्यम वर्ग मिटने के कगार पर पहुंच गया हैं। इसके बाद भी सरकारों का इस विषय पर न सोचना भारत के भविष्य के लिए चिंता का विषय हैं।
ताजा आये अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आकड़ों को देखे तो भारत में रोजगार लगभग समाप्त हो चुके है और स्वरोजगार के लिए ढांचागत विकास न के बराबर हैं। निजीकरण की ऐसी मार देश ने अपने इतिहास में कभी नहीं झेली जब पूंजी का एकत्रीकरण कुछ चुनिंदा लोगों की जेबों में चला गया हैं। आम जन मानस के पास पैसे का वितरण रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी नहीं हो पा रहा हैं। इन सब के इतर पैसे के असामान्य वितरण का हाल ये हैं कि सरकारों की नीतियों से अमीर और अमीर होता जा रहा हैं और गरीब और गरीब।
आज भारत की वास्तविक स्थिति यह है कि रोजगार के क्षेत्र में यह अपने पड़ोसियों से भी पिछड़ गया हैं। ढांचागत विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने जो पैसे लगाए है वो केवल परिवहन और बिजली व्यवस्था को सुधार रहें है जिनका लम्बी अवधि में रोजगार से कोई लेना देना नहीं हैं। सामाजिक मद में भी सरकारों ने जो पैसे लगाए है वो केवल स्वास्थ और शिक्षा के क्षेत्र में हैं जिसका लम्बी अवधि में रोजगार से कुछ लेना देना नहीं हैं।
रोजगार उत्पन्न करने वाले क्षेत्रों में सरकारों ने विदेशी पूंजी निवेश के जो नियम बनाए हैं वो फलदायी साबित नहीं हुए। सरकार पिछले कई सालों से ढांचागत सुधार ही कर रही हैं और इस मद का बहुत सा पैसा भ्रस्टाचार की भेट चढ़ जाता है जो कि एक वास्तविकता हैं। २१वीं सदी के भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार की आवश्यकता है जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सके। पर कोई भी सरकार इस मद में न तो खर्च करना चाहती है और न ही उसकी दिशा निर्धारित कर पा रही हैं।
ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से कब उतर जाए कहाँ नहीं जा सकता।
-संपादकीय
ताजा आये अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आकड़ों को देखे तो भारत में रोजगार लगभग समाप्त हो चुके है और स्वरोजगार के लिए ढांचागत विकास न के बराबर हैं। निजीकरण की ऐसी मार देश ने अपने इतिहास में कभी नहीं झेली जब पूंजी का एकत्रीकरण कुछ चुनिंदा लोगों की जेबों में चला गया हैं। आम जन मानस के पास पैसे का वितरण रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी नहीं हो पा रहा हैं। इन सब के इतर पैसे के असामान्य वितरण का हाल ये हैं कि सरकारों की नीतियों से अमीर और अमीर होता जा रहा हैं और गरीब और गरीब।
आज भारत की वास्तविक स्थिति यह है कि रोजगार के क्षेत्र में यह अपने पड़ोसियों से भी पिछड़ गया हैं। ढांचागत विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने जो पैसे लगाए है वो केवल परिवहन और बिजली व्यवस्था को सुधार रहें है जिनका लम्बी अवधि में रोजगार से कोई लेना देना नहीं हैं। सामाजिक मद में भी सरकारों ने जो पैसे लगाए है वो केवल स्वास्थ और शिक्षा के क्षेत्र में हैं जिसका लम्बी अवधि में रोजगार से कुछ लेना देना नहीं हैं।
रोजगार उत्पन्न करने वाले क्षेत्रों में सरकारों ने विदेशी पूंजी निवेश के जो नियम बनाए हैं वो फलदायी साबित नहीं हुए। सरकार पिछले कई सालों से ढांचागत सुधार ही कर रही हैं और इस मद का बहुत सा पैसा भ्रस्टाचार की भेट चढ़ जाता है जो कि एक वास्तविकता हैं। २१वीं सदी के भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार की आवश्यकता है जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सके। पर कोई भी सरकार इस मद में न तो खर्च करना चाहती है और न ही उसकी दिशा निर्धारित कर पा रही हैं।
ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से कब उतर जाए कहाँ नहीं जा सकता।
-संपादकीय


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