प्रेम तो आनंद है, फिर दुख क्यों! - Kashi Patrika

प्रेम तो आनंद है, फिर दुख क्यों!

'प्रेम' शब्द सुनते ही तुम उसे फिल्मी प्रेम से जोड़कर सपने बुनने लगते हो, फिर-

इश्क का कोई नतीजा नहीं
जुज दर्दो-आलम।
दुख और दर्द के सिवा कुछ भी नतीजा नहीं है। यानी दुःख के सिवा कुछ हासिल
नहीं होता। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं वह कुछ और है, जो मीरा ने किया, कबीर ने किया, नानक ने किया। वहां दुख नहीं है, वहां आनंद की पर्त पर पर्त खुलती चली जाती है। और अगर तुम इस प्रेम को न जान पाए तो जानना, जिंदगी व्यर्थ गई।

दूर से आए थे साकी,
सुनकर मैखाने को हम।
पर तरसते ही चले,
अफसोस पैमाने को हम।

मरते वक्त ऐसा न कहना पड़े तुम्हें कि कितनी दूर से आए थे। दूर से आए थे साकी सुनकर मैखाने को हम- मधुशाला की खबर सुनकर कहां से तुम्हारा आना हुआ जारा सोचो तो! कितनी दूर की यात्रा से तुम आए हो। पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम- यहां एक घूंट भी न मिला।

मरते वक्त अधिक लोगों की आंखों में यही भाव होता है। तरसते हुए जाते हैं। हां, कभी-कभी ऐसा घटता है कि कोई भक्त, कोई प्रेमी परमात्मा का तरसता हुआ नहीं जाता, लबालब जाता है।

मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूं। आंख खोलकर एक प्रेम होता है, वह रूप से है। आंख बंद करके एक प्रेम होता है, व अरूप से है। कुछ पा लेने की इच्छा से एक प्रेम होता है वह लोभ है, लिप्सा है। अपने को समर्पित कर देने का एक प्रेम होता है, वही भक्ति है।

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