बेबाक हस्तक्षेप - Kashi Patrika

बेबाक हस्तक्षेप

मानसून की बारिश शुरू हो गई हैं। दक्षिण के कई राज्यों में पहली बारिश में ही वॉटर लॉगिंग की समस्या बड़े पैमाने पर फिर से उभर कर सामने आई हैं। मुद्दा हर साल होने वाली बारिश और उस से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का हैं तो प्रकृतिक जनित मान कर इसे छोटा आका जाता हैं। पर क्या यह मुद्दा छोटा हैं ? आज विश्व के लगभग सभी देशों ने जो प्रगति की हैं उस में विज्ञान का उतना ही पुट हैं जितना व्यवस्थाओं के सही निस्तारण का। पर भारत इसके इतर केवल विश्व गुरु का दम्भ भर रहा हैं। यहाँ हर छोटी से बड़ी चीज बाहर से आयात की जाती हैं और जब मुद्दा नई नई खोजों का हो तो हम सम्पूर्ण रूप से विश्व की तकनीकों पर आश्रित हैं। आजादी के इतने सालों बाद भी सरकार शोध के क्षेत्र में न के बराबर तरक्की कर पाई हैं।

हमारी बारिश के दिनों में अतरिक्त पानी की समस्या के निस्तारण का विषय जस का तस बना हुआ हैं। बारिश के असामान्य वितरण का इलाज अब तक नहीं ढूंढा जा सका हैं। बारिश के बाद अतरिक्त जल को नहरों और तालाबों के द्वारा संरक्षित करने का मुद्दा जस का तस बना हुआ हैं। सीवेज सिस्टम की खस्ता हाल स्थिति जस की तस बनी हुई हैं। सड़कों पर वॉटर लॉगिंग की समस्या जस की तस बनी हुई हैं। और सरकारे हमें कभी राम के नाम पर तो सीता के टेस्ट ट्यूब बेबी होने के नाम पर भरमाती रहती हैं।

दम्भ इतना की भारत विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर हैं। २०१४ का केंद के चुनाव में इन्ही सब मुद्दों का पुट था जिसने मोदी सरकार को केंद्र की सत्ता में काबिज किया था। पर मोदी सरकार की नाकामियों का जो सिलसिला चार साल तक चलता रहा उसे आम जनता को एक साल और झेलना पड़ेगा। इस साल भी बारिश होगी और बारिश के बाद शहरों में नाले उफान पर होंगे। नदियों में बाढ़ का प्रकोप आएगा और उससे बचाव के उपाय पर कार्य न हो पाने की एवज में कितनी जिंदगियाँ तबाह होंगी। बारिश के बाद वॉटर लॉगिंग की समस्या होगी जो कई तरह की बिमारिओं को जन्म देंगी। इन से कई जिंदगियां फिर से तबाह होंगी और सरकार का रटा रटाया उत्तर सामने आएगा कि  इस मौसम में लोग मरते ही हैं। पर इन सब के बीच सरकार की मूलभूत समस्याओं पर कुछ न कर पाने की नाकामियों पर चर्चा नहीं हो पाएगी। तो इस सब के बीच बारिश का आनंद ले और खुद को भगवान् भरोसे ही मान कर आप आगे बढ़ते रहे।

:संपादकीय 

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