समर्पण में आनंद है/ओशो - Kashi Patrika

समर्पण में आनंद है/ओशो

पुरुष सदा संघर्षरत है, क्रोधित, सदा कुछ न कुछ करता रहता है, कुछ साबित करने का प्रयास करता रहता है, कहीं पहुंचने का प्रयास करता रहता है। स्त्री प्रसन्न है, कहीं पहुंचने का प्रयास नहीं है...

पुरुष आक्रामक है, पुरुष सदा एक संघर्ष में है। स्त्री सदा ही समर्पण की दशा में है, एक गहरे विश्वास में है। वह प्रकृति के साथ एक गहरे ट्रस्ट और एक गहरे लय में है। स्त्री एक गहरी समर्पण की दशा में जीती है। पुरुष सदा संघर्षरत है, क्रोधित, सदा कुछ न कुछ करता रहता है, कुछ साबित करने का प्रयास करता रहता है, कहीं पहुंचने का प्रयास करता रहता है। स्त्री प्रसन्न है, कहीं पहुंचने का प्रयास नहीं है। स्त्री से पूछो कि क्या उसे चांद पर जाना है? वह बहुत आश्चर्य चकित होगी। 'किसलिए'? क्या अर्थ है? इतना श्रम क्यों उठाना? घर में होना पूरी तरह ठीक है।' स्त्री को रस नहीं है कि वियतनाम में क्या हो रहा है और कोरिया में क्या हो रहा है और इसराइल में क्या हो रहा है। अगर उसे कुछ रस है, तो अधिक से अधिक कि पड़ोस में क्या हो रहा है, अधिक से अधिक कि कौन किसके प्रेम में पड़ गया, उसका रस बस गप-शप में है, राजनीति में नहीं।

तुम जीवन में बहुत कुछ खो देते हो, क्योंकि तुम्हारा सिर सदा बात करता रहता है। यह तुम्हें चुप होने नहीं देता। और मस्तिष्क का गुण मात्र इतना है कि यह अधिक तार्किक, धूर्त, खतरनाक और हिंसक है। अपने हिंसक गुण के कारण यह भीतर मालिक बन गया है और भीतर के इस लीडरशिप के कारण आदमी बाहर भी लीडर बन गया है। आदमी ने बाहरी दुनिया में भी स्त्री के ऊपर मालकियत कर रखी है-अनुग्रह के ऊपर हिंसा ने मालकियत जमा ली है।

पुरुष मन एक संघर्ष पैदा करने की घटना हो गया है; इसलिए यह प्रभुत्व जमाता है, यह दूसरे पर मालकियत करता है। लेकिन भीतर गहरे में, यद्यपि तुम बलशाली हो भी जाओ, तुम जीवन को खो देते हो और भीतर गहरे में, तुम्हारा स्त्रैण चित्त गति करता रहता है।

जब तक तुम वापस स्त्रैणता को नहीं प्राप्त कर लेते और तुम समर्पण नहीं करते, जब तक तुम्हारा प्रतिरोध और संघर्ष समर्पण नहीं बनते, तब तक तुम वास्तविक जीवन और उसके उत्सव को नहीं जान सकते।

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