प्रभु राम के नाम पर वोटों की बरसात अपनी तरफ बटोरने वाली भाजपा इस चुनाव में राम मंदिर मुद्दे को राम-राम करने का मूड बना रही है। इसे लेकर अयोध्या के साधु-संत और उनके हिंदू संगठनों में रोष फैल गया है। राम को लेकर सियासत गर्म होता दिख रहा है और पहले से दोस्तों की नाराजगी झेल रही भाजपा के लिए ऐसे में दुश्वारियां बढ़ सकती हैं।
अयोध्या के संत समाज का आरोप है कि भाजपा ने हिंदू भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है। राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने तो यहां तक कह दिया, 'राम के साथ एक प्रकार से पार्टी ने धोखाधड़ी की है। राम के नाम से पार्टी सत्ता में आई और फिर राम को भूल गई। अगर पार्टी 2019 में जीतना चाहती है, तो उसे राम मंदिर का निर्माण शुरू कर देना चाहिए, नहीं तो उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी।' ऐसे ही विचार दूसरे साधु-संतों और उनके आखड़ों से सुनने को मिल रहे हैं। राम जन्मभूमि न्यास के पूर्व महंत और दिगंबर अखाड़ा के परमहंस दास ने भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा, "अगर भाजपा 2019 में फिर से सत्ता में आना चाहती है तो उसे राम मंदिर बनाना ही होगा। अगर भाजपा ऐसा नहीं करेगी तो हम उसके खिलाफ आंदोलन शुरू करेंगे, इसके बाद उनकी हार निश्चित होगी। हाल ही में विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने भी मोदी सरकार को यह कहते हुए कठघरे में खड़ा किया था कि भाजपा ने राम के नाम पर सिर्फ सियासत किया है।
सारा विवाद केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के उस बयान से शुरू हुआ, जो उन्होंने गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान दिया। नकवी ने कहा था, "2019 के चुनावों में हिंदुत्व और राम मंदिर जैसे मुद्दों के लिए कोई जगह नहीं होगी, विकास ही हमारा एक सूत्रीय एजेंडा होगा। पीएम मोदी ही नहीं, भाजपा का भी मुख्य मुद्दा विकास है।" सियासी पंडितों की मानें, तो भाजपा समझ गई है कि विपक्ष की एकता के सामने हिंदुत्व कार्ड पर इस बार चलना मुश्किल होगा। कैराना और नूरपुर उपचुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त के बाद पार्टी ने अपने रुख में बदलाव करते हुए विकास का एजेंडा टॉप पर रख दिया है। किंतु, पासा उल्टा भी पड़ सकता है।
दरअसल, भाजपा के लिए राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से ही बड़ा मुद्दा रहा है। यूपी के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस मुद्दे पर उसे बड़ी संख्या में हिंदुओं ने वोट दिए थे। लोगों को लगा था कि केंद्र और यूपी में भाजपा सरकार होने से अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जल्द हो पाएगा। भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में भी राम मंदिर का मुद्दा शामिल था। पार्टी विकास और अर्थव्यवस्था को घोषणा पत्र में शीर्ष पर रखा था और अंतिम दो पंक्तियों में राम मंदिर का जिक्र किया था। घोषणा पत्र में कहा गया था, 'भाजपा अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए संविधान के भीतर सभी संभावनाएं तलाशने के अपने रुख को दोहराती है।'
राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अयोध्या विवाद में पक्षकारों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इसके अलावा पूजा के अधिकार के संबंध में सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुनवाई की जाएगी। अयोध्या मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही आखाड़ा तीन पक्ष हैं। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों बांटने का आदेश दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में विवादित 2.77 एकड़ जमीन 3 बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। अदालत ने रामलला की मूर्ति वाली जगह रामलला विराजमान को दी। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को और बाकी हिस्सा मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया था।
कुल मिलाकर, अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि राम मंदिर पर शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई बयान नहीं आया है। तत्कालीन सच यह है कि रोजगार, काला धन वापसी, विकास, गंगा सफाई के नाम पर खुद को लगभग ठगा महसूस करने वाली जनता को लग रहा है कि “राम” के नाम पर भी एक बार फिर छल ही होने वाला है।
अयोध्या के संत समाज का आरोप है कि भाजपा ने हिंदू भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है। राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने तो यहां तक कह दिया, 'राम के साथ एक प्रकार से पार्टी ने धोखाधड़ी की है। राम के नाम से पार्टी सत्ता में आई और फिर राम को भूल गई। अगर पार्टी 2019 में जीतना चाहती है, तो उसे राम मंदिर का निर्माण शुरू कर देना चाहिए, नहीं तो उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी।' ऐसे ही विचार दूसरे साधु-संतों और उनके आखड़ों से सुनने को मिल रहे हैं। राम जन्मभूमि न्यास के पूर्व महंत और दिगंबर अखाड़ा के परमहंस दास ने भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा, "अगर भाजपा 2019 में फिर से सत्ता में आना चाहती है तो उसे राम मंदिर बनाना ही होगा। अगर भाजपा ऐसा नहीं करेगी तो हम उसके खिलाफ आंदोलन शुरू करेंगे, इसके बाद उनकी हार निश्चित होगी। हाल ही में विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने भी मोदी सरकार को यह कहते हुए कठघरे में खड़ा किया था कि भाजपा ने राम के नाम पर सिर्फ सियासत किया है।
सारा विवाद केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के उस बयान से शुरू हुआ, जो उन्होंने गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान दिया। नकवी ने कहा था, "2019 के चुनावों में हिंदुत्व और राम मंदिर जैसे मुद्दों के लिए कोई जगह नहीं होगी, विकास ही हमारा एक सूत्रीय एजेंडा होगा। पीएम मोदी ही नहीं, भाजपा का भी मुख्य मुद्दा विकास है।" सियासी पंडितों की मानें, तो भाजपा समझ गई है कि विपक्ष की एकता के सामने हिंदुत्व कार्ड पर इस बार चलना मुश्किल होगा। कैराना और नूरपुर उपचुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त के बाद पार्टी ने अपने रुख में बदलाव करते हुए विकास का एजेंडा टॉप पर रख दिया है। किंतु, पासा उल्टा भी पड़ सकता है।
दरअसल, भाजपा के लिए राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से ही बड़ा मुद्दा रहा है। यूपी के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस मुद्दे पर उसे बड़ी संख्या में हिंदुओं ने वोट दिए थे। लोगों को लगा था कि केंद्र और यूपी में भाजपा सरकार होने से अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जल्द हो पाएगा। भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में भी राम मंदिर का मुद्दा शामिल था। पार्टी विकास और अर्थव्यवस्था को घोषणा पत्र में शीर्ष पर रखा था और अंतिम दो पंक्तियों में राम मंदिर का जिक्र किया था। घोषणा पत्र में कहा गया था, 'भाजपा अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए संविधान के भीतर सभी संभावनाएं तलाशने के अपने रुख को दोहराती है।'
राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट अयोध्या विवाद में पक्षकारों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इसके अलावा पूजा के अधिकार के संबंध में सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुनवाई की जाएगी। अयोध्या मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही आखाड़ा तीन पक्ष हैं। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों बांटने का आदेश दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में विवादित 2.77 एकड़ जमीन 3 बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। अदालत ने रामलला की मूर्ति वाली जगह रामलला विराजमान को दी। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को और बाकी हिस्सा मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया था।
कुल मिलाकर, अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि राम मंदिर पर शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई बयान नहीं आया है। तत्कालीन सच यह है कि रोजगार, काला धन वापसी, विकास, गंगा सफाई के नाम पर खुद को लगभग ठगा महसूस करने वाली जनता को लग रहा है कि “राम” के नाम पर भी एक बार फिर छल ही होने वाला है।
■ संपादकीय


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