महिला सशक्तिकरण: कितने दूर कितने पास - Kashi Patrika

महिला सशक्तिकरण: कितने दूर कितने पास


सन २०१४ की सरकार का सबसे ज्वलंत मुद्दों में से एक था महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध पर लगाम लगाना। मानवता को शर्मसार करने वाला निर्भया काण्ड हाल ही में हुआ था। आम जन मानस में एक आक्रोश की स्थिति थी जो दिल्ली में आंदोलन के रूप में दिखाई दे रही थी। सभी का मानना था कि सभ्य समाज और वो भी खासकर भारत जहाँ महिलाओं को पुंजा जाता हैं वहां इस तरह की घटना फिर कभी न होने पाए। इसके लिए कड़े कानून बनाने होंगे।

पर २०१४ बीता और समय की साथ सुलगती आग भी ठंढी हो चली। समाज में आज भी अधिकतर महिलाओं का सामाजिक स्तर दोयम दर्जे का हैं। पुरुष प्रधान देश में उन्हें आज भी पुरुषों के अधीन ही सभी कार्य करना पड़ रहा हैं। शहरों से बहार निकले तो स्थिति और दयनीय हो जाती हैं वही चूल्हा-चौका और दोयम दर्जे की नागरिकता। आकड़ों की माने तो बीते सालों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में ८३ % की बढ़ोत्तरी हुई हैं।

आज भी परिवार के सभी बड़े फैसले पुरुषों के द्वारा लिए जाते हैं और महिलाओं को केवल घर गृहस्ती का सामान समझा जाता हैं। मुस्लिम महिलाओं की स्थिति तो और दयनीय हैं यहाँ उन्हें आज भी बुर्के के अंदर एक सामान के रूप में रखा जाता हैं। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के दायरा समाज तक ही सिमित नहीं हैं वरन कभी कभी वो घर में भी सुरक्षित नहीं होती हैं।

आज भी महिलाओं को स्वतंत्र रूप से आरक्षण नहीं प्रदान किया गया हैं जो कि सरकार की मंशा और इरादों को जाहिर करती हैं। महिला सांसदों की स्थिति जस की तस बनी हुई हैं और किसी का उस ओर कोई ध्यान भी नहीं हैं।
तत्कालीन सरकार के द्वारा महिला सशक्तिकरण के कोई भी उपाय धरातल पर नहीं उतर सके। सभी छोटी बड़ी योजनाओं में वही कढ़ाई-बुनाई जैसे कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा हैं जो एक स्वरोजगार कम और महिलाओं के साथ उपहास ज्यादा प्रतीत होता हैं।

:सिद्धार्थ सिंह 

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