किसानों की मांग जायज है या नहीँ, इस सवाल में उलझने से पहले यह चर्चा जरूरी हो जाता है कि क्या विरोध का यह तरीका सही है? सब्जियां-दूध-फल सड़क पर फेंकना कहा तक उचित है, आखिर अन्न दाता ही अन्न की इस बेकदरी पर क्यों मजबूर है? सरकारें चाहे केंद्र में हो या राज्य में बदलती रहती हैं, लेकिन नहीं बदलती है तो किसानों की तकदीर, उनके गांव की तस्वीर। किसान आत्महत्यों को मजबूर लंबे अरसे से है, इसलिए ठीकरा केंद्र की भाजपा सरकार के सिर पर फोड़ना उचित नहीं होगा! किंतु क्या भाजपा ने किसानों से किया वादा पूरा किया?
हालही में कर्नाटक चुनाव और उसके बाद चन्द घंटो की सरकार बनाने के बाद वहां भी भाजपा में किसानों का हाल बदलने की बात कही थी, फिर केंद्र में उसकी सरकार होते हुए देशभर के किसानों का हाल बेहाल क्यों है? नतीजतन देशभर के किसान सड़क पर हैं। तिस पर किसान का दर्द समझने की कोशिश करने की बजाय केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि किसानों ने मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए असामान्य तरीका अपनाया है। तो, सीएम मनोहर लाल खट्टर का मनना है, “किसानों के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वो इस तरह का रास्ता अपना रहे हैं। सामान न बेच कर किसान अपना ही नुकसान करेंगे।” उधर, मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने अपने राज्य के किसानों को सुखी-सम्पन्न घोषित कर दिया है।
आखिर, फिर देश के सात राज्यों में किसान सड़क पर क्यों उतर आए हैं! किसानों का आरोप है कि सरकार अपना वादा भूल गए है। किसानों ने विरोध में 10 दिवसीय आंदोलन पर है। उनकी मांग उनके उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों समेत कई अन्य मुद्दों को लेकर किया गया है। किसानों का आरोप है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के बारे तो मोदी सरकार बात ही नहीं कर रही है। 2006 में जो सिफारिशें स्वामीनाथन आयोग ने दी थीं, उसे 11 सितंबर 2007 को ही पिछली कांग्रेस सरकार ने स्वीकर किया था। बाद में मोदी की सरकार आई और उसने भी किसानों के सुधार की बात कही, लेकिन उसने भी इसे चुनावी जुमला कहकर छोड़ दिया।
ज्ञात हो कि यूपीए सरकार ने किसानों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक आयोग का गठन किया जिसे स्वामीनाथन आयोग कहा गया। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर, अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना आदि शामिल है। इसमें किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं।
फिलहाल, सरकार किसानों की मांग पर चुप्पी साधे है। विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर चुनावी रोटियां सेंकने की जुगत लगा रहा है। इन सबके बीच किसान सड़कों पर है और अपनी बोई मेहनत सड़क पर फेंकने को मजबूर भी। किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा (सरकार द्वारा कोर्ट में पेश :हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म करते हैं) मौन है।
-संपादकीय
हालही में कर्नाटक चुनाव और उसके बाद चन्द घंटो की सरकार बनाने के बाद वहां भी भाजपा में किसानों का हाल बदलने की बात कही थी, फिर केंद्र में उसकी सरकार होते हुए देशभर के किसानों का हाल बेहाल क्यों है? नतीजतन देशभर के किसान सड़क पर हैं। तिस पर किसान का दर्द समझने की कोशिश करने की बजाय केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि किसानों ने मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए असामान्य तरीका अपनाया है। तो, सीएम मनोहर लाल खट्टर का मनना है, “किसानों के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वो इस तरह का रास्ता अपना रहे हैं। सामान न बेच कर किसान अपना ही नुकसान करेंगे।” उधर, मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने अपने राज्य के किसानों को सुखी-सम्पन्न घोषित कर दिया है।
आखिर, फिर देश के सात राज्यों में किसान सड़क पर क्यों उतर आए हैं! किसानों का आरोप है कि सरकार अपना वादा भूल गए है। किसानों ने विरोध में 10 दिवसीय आंदोलन पर है। उनकी मांग उनके उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों समेत कई अन्य मुद्दों को लेकर किया गया है। किसानों का आरोप है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के बारे तो मोदी सरकार बात ही नहीं कर रही है। 2006 में जो सिफारिशें स्वामीनाथन आयोग ने दी थीं, उसे 11 सितंबर 2007 को ही पिछली कांग्रेस सरकार ने स्वीकर किया था। बाद में मोदी की सरकार आई और उसने भी किसानों के सुधार की बात कही, लेकिन उसने भी इसे चुनावी जुमला कहकर छोड़ दिया।
ज्ञात हो कि यूपीए सरकार ने किसानों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक आयोग का गठन किया जिसे स्वामीनाथन आयोग कहा गया। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर, अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना आदि शामिल है। इसमें किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं।
फिलहाल, सरकार किसानों की मांग पर चुप्पी साधे है। विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर चुनावी रोटियां सेंकने की जुगत लगा रहा है। इन सबके बीच किसान सड़कों पर है और अपनी बोई मेहनत सड़क पर फेंकने को मजबूर भी। किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा (सरकार द्वारा कोर्ट में पेश :हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म करते हैं) मौन है।
-संपादकीय


No comments:
Post a Comment