न सही कुछ मगर इतना तो किया करते थे,
वो मुझे देख के पहचान लिया करते थे।
आखिर-ए-कार हुए तेरी रजा के पाबंद
हम कि हर बात पे इसरार किया करते थे।
खाक हैं अब तिरी गलियों की वो इज्जत वाले
जो तिरे शहर का पानी न पिया करते थे।
अब तो इंसान की अज्मत भी कोई चीज नहीं
लोग पत्थर को खुदा मान लिया करते थे।
दोस्तो अब मुझे गर्दन-जदनी कहते हो
तुम वही हो कि मिरे जख्म सिया करते थे।
हम जो दस्तक कभी देते थे सबा की मानिंद
आप दरवाजा-ए-दिल खोल दिया करते थे।
अब तो 'शहजाद' सितारों पे लगी हैं नजरें
कभी हम लोग भी मिट्टी में जिया करते थे।।
■ शहजाद अहमद
वो मुझे देख के पहचान लिया करते थे।
आखिर-ए-कार हुए तेरी रजा के पाबंद
हम कि हर बात पे इसरार किया करते थे।
खाक हैं अब तिरी गलियों की वो इज्जत वाले
जो तिरे शहर का पानी न पिया करते थे।
अब तो इंसान की अज्मत भी कोई चीज नहीं
लोग पत्थर को खुदा मान लिया करते थे।
दोस्तो अब मुझे गर्दन-जदनी कहते हो
तुम वही हो कि मिरे जख्म सिया करते थे।
हम जो दस्तक कभी देते थे सबा की मानिंद
आप दरवाजा-ए-दिल खोल दिया करते थे।
अब तो 'शहजाद' सितारों पे लगी हैं नजरें
कभी हम लोग भी मिट्टी में जिया करते थे।।
■ शहजाद अहमद



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