जुमलों की सरकार के चार साल बीत चुके हैं और धरातल पर कोई भी कार्य ऐसा नहीं हुआ हैं जो केंद्र सरकार की नीतियों की गवाही दे की केंद्र सरकार ने व्यवस्था परिवर्तन के लिए कार्य किया हैं। जुमलों का सिलसिला जो २०१४ के लोकसभा चुनावों से पहले जारी हुआ वो बदस्तूर अब तक बना हुआ हैं। ११२ केंद्रीय योजनाओं वाली यह केंद्र सरकार एक भी योजना सुचारु रूप से धरातल पर नहीं उतार सकी। सत्ता के केंद्र में चार सालों में मोदी ही बने रहे और ऐसा भी नहीं हैं कि उनकी सर्वमान्यता को किसी ने चुनौती दी हो।
तो क्या ये माना जाए की मोदी पूर्ण रूप से विफल साबित हुए हैं ? हालिया उपचुनाव नतीजे और एक एक कर एनडीए के घटक दलों का साथ छोड़ना तो यही दर्शाता हैं। आकड़े भी यही गवाही देते हैं कि सरकार की नीतियों से आम जन मानस की स्थिति में कोई भी बदलाव नहीं हुआ हैं।
फिर चाहे ने रोजगारों का सृजन हो, या मेक इन इण्डिया में विदेशी निवेश, सुरक्षा का मुद्दा हो, या फिर चाहे लोगों के जीवन स्तर में बढ़ोतरी का, स्वास्थ का मुद्दा हो या स्किल इण्डिया जैसी नीतियों का। हर एक क्षेत्र में सरकार पिछड़ती नजर आ रही हैं।
बीते चार सालों में मोदी हर समय चुनावी मूड में ही नजर आए यहाँ तक कि विदेशी दौरों में भी वो विपक्ष की नाकामियां ही गिनाते नजर आए। हर चुनावों के पहले केंद्र सरकार ने कोई न कोई वादा किया जो यही इशारा करता हैं कि मोदी २०१४ के बाद से चुनावी प्रचार से बाहर निकल ही नहीं पाए। जब चुनावों से बाहर ही नहीं निकले तो लोगों के दुःख दर्द को कैसे बात पाते।
सरकार की हनक और धौस ऐसी की कई बार लेखकों और कलाकारों ने मिलकर सरकार का विरोध किया पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
पूर्व सैनिकों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला पर फिर भी सरकार मौन बनी रही। हद तो तब हो गई जब कई बार किसानों ने सरकार के खिलाफ जमकर आंदोलन किया और सरकार निजीकरण को बढ़ावा देती रही। यवाओं के विरोध का भी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
आज स्थिति यह हैं की व्याप्त अराजकता के बीच मोदी विदेशी दौरों पर घूम रहे हैं और देश में पिछड़ा वर्ग, युवा, उद्यमी, कामगार सभी सरकार से नाराज हैं। इसपर भी सरकार अपनी नीतियां बदलने को तैयार नहीं हैं और अपने घटक दलों को साध कर पीछे के दरवाजे से कुर्सी हथियाँ लेना चाहती हैं।



No comments:
Post a Comment