हर हाथ को काम नहीं मिलेगा, तो भविष्य में सामाजिक स्तर पर गंभीर समस्याओं का सामना करना होगा। कृषि व उद्योग व्यापार का भी टकराव नहीं होना चाहिये। संतुलित विकास में दोनों का योगदान है- पण्डित दीनदयाल उपाध्यायपण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानव दर्शन में अंत्योदय की बात की हैं। यह अंत्योदय ही हैं, जिसकी धुरी पर राष्ट्र का सुचारू रूप से संचालन हो सकता हैं। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र की आत्मा के विषय में भी कहा हैं। उनका भारत के विषय में गहन अध्ययन ही उन्हें भारतीय मनीषियों के पंक्ति में खड़ा करता हैं।
उनका अध्ययन ठीक वैसा ही हैं जैसा कभी गाँधी जी ने देशाटन के फलस्वरूप ग्रहण किया था। आजादी के बाद पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने पूरे भारत में घूम कर भारत को करीब से जानने का प्रयास किया। उन्होंने अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में हमेशा आधुनिक शिक्षा के महत्व को समझा और हर सभ्यता के अच्छे पहलू को ग्रहण करने पर बल भी दिया। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय कभी नहीं चाहते थे कि भारत कूप-मंडूक बना रहे। इसको ध्यान में रखकर ही उन्होंने समाजवाद, साम्यवाद, और पश्चिम के उपभोगतावाद का गहन अध्ययन किया। इस गहन अध्ययन के परिणाम स्वरुप उन्होंने इनकी खामियों को भी उजागर किया और राष्ट्रवाद को अपनाने का विचार प्रस्तुत किया।
वर्तमान में किसानों की स्थिति
बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने आम जन मानस को पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को जोर शोर से अपनाने की वकालत की। पर कार्य ठीक इसके विपरीत करते चले। आज उन्हीं कार्यों का परिणाम हैं कि गाहे बगाहे किसान मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन करते रहते हैं। पर इन सब पर ध्यान देने की बजाय मोदी ने आधुनिकता और निजीकरण को बढ़ावा देना बेहतर समझा। अब या तो ये माना जाए कि पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के विचार गलत हैं या ये केवल वो विचार हैं जिनपर आम लोगों को चलना हैं और सरकार ठीक इसके विपरीत चलेगी। हालांकि, आपको बताते चले कि साम्यवाद की निंदा करते हुए पण्डित दीनदयाल उपाध्याय लिखते हैं कि शासन तंत्र को सर्वोपरी मानना सबसे बड़ी भूल हैं और मोदी ठीक इसे ही सही मान बैठे।
रोजगार का गिरता स्तर
मोदी सरकार के सत्ता में आते ही मानो रोजगार जैसे समाप्त सा हो गया। मोदी सरकार ने सरकारी रोजगार में जमकर कटौती की। और प्राईवेट रोजगार पहले से ही बुरी स्थिति में था, जिसमें 2014 के बाद और गिरावट आई। तो क्या ये मान के चला जाए की सबकुछ जानते हुए भी मोदी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे स्वयं पण्डित दीनदयाल के शब्दों में 'हर हाथ को काम नहीं मिलेगा, तो भविष्य में सामाजिक स्तर पर गंभीर समस्याओं का सामना करना होगा।'तो क्या मोदी ने खुद पण्डित दीनदयाल उपाध्याय को नकार दिया।
राष्ट्रवाद बनाम आतताई शासन
पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए कही नहीं लिखा हैं कि इसे आतताई शासन होना चाहिए। पर वर्तमान सरकार ने सत्ता के मद में राष्ट्रवाद को भी नाकार दिया और एक आतताई शासन की ओर बढ़ गए। विरोध के स्वर को दबाने के लिए सरकार ने हर वो कदम उठाया जो निंदनीय था। आप स्वयं फैसला कर सकते हैं कि वो कौन सा शासन होगा जिसमें विरोध करने पर अपनी ही जनता को दूसरे देश की नागरिकता लेने को कहा हो। मीडिया पर प्रतिबंध लगाया हो और बड़े पैमाने पर पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को हाथ पर हाथ धरे बैठे देखा रहा हो।
◼️काशी पत्रिका


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