बेबाक हस्तक्षेप - Kashi Patrika

बेबाक हस्तक्षेप

आज की तेजी से आगे बढ़ती और बदलती दुनियाँ में भारत को भी तेजी से विकास और देश में अमूल चूल परिवर्तन करने होंगे। ये समय की मांग भी हैं और इसके उतरोत्तर कोई दूसरा चारा भी नहीं हैं।एक ओर विश्व में जहाँ पश्चिम का विकास अत्यधिक तेज गति से हुआ वही पूरब कही पीछे छूट गया। पश्चिम में 16 वीं शताब्दी में ही औद्योगिक विकास हो गया जो भारत में अब तक संभव नहीं हो पाया हैं। भारत में औद्योगिक विकास को केवल बड़े पैमाने पर उद्द्योगो के विकास से जोड़ कर देखा जाता हैं। पर वास्तव में ऐसा नहीं हैं। औद्योगिक विकास के मूल में नए-नए अविष्कार हैं जिनकी एक लम्बी श्रृंखला हैं। वैज्ञानिक परिक्षण हैं और उनका सैद्धांतिकरण हैं। 

ये पश्चिम ही था जिसने यातायात के साधन विकसित किए,बड़े-बड़े भवनों और पुलों का निर्माण करना बताया, आधुनिक हर प्रयोग को उनके अंजाम तक पहुंचाया और जीवन की बहुत सी कठिनाइयों को सरल बनाया। जिस समय पश्चिम विकास की नई इबादत लिख रहा था उस समय हमारा देश धीरे-धीरे विश्व का सबसे बड़ा उपभोगतावादी देश बन कर उभर रहा था। हमने अपनी उपभोगतावादी एक ऐसी संस्कृति और विचारधारा के इर्द गिर्द ही देश का विकास होने दिया, जो आज भी यथार्थ रूप से चल रहा हैं और जिसको सही दिशा देने  का कार्य अब भी बाकि हैं। 

आज भारत जिस संकर काल से गुजर रहा हैं वहां केवल एक छोटी सी भूल हमारी सभी व्यवस्था को पटरी से उतार सकती हैं। हम आज भी सभी मुख्य वस्तुओं और वैज्ञानिक खोजों का आयात करते हैं। इन्ही आयातित प्रयोगों के आधार पर भारत अपनी व्यवस्था करता हैं। न कोई शिक्षा संस्थान जिसने विज्ञान के क्षेत्र में उचाईयों को छुआ हो, न कोई बड़ा सामाजिक प्रयोग जिससे बड़े पैमाने पर गरीबी और भुखमरी को दूर किया जा सके, न ही कोई बड़ा सामाजिक परिवर्तन जो पुरानी रूढ़ियों को जड़ से उखाड़ सके। 

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद कुछ ऐसे ही तार्किक और यथार्थ से जुड़े बदलावों की आवश्यकता थी पर अब जब तत्कालीन केंद्र सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम पड़ाव पर हैं तो अभी तक इस सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो सही दिशा में देश को धीरे धीरे ही सही पर आगे बढ़ा पाता। 
-संपादकीय 

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