पांडवों के पांचों पुत्र अश्वत्थामा के हाथों मारे गए और अभिमन्यु पहले ही युद्ध में मार जा चुका था। पांडवों के वंश में अगला कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा था। अभिमन्यु की पत्नी सुभद्रा गर्भ से थी और युद्ध समाप्ति के बाद सुभद्रा ने नियत समय पर एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन जन्म के उपरांत सुभद्रा का पुत्र रोया नहीं और एकदम निढाल जैसी स्थिति में था। बच्चे को तुरन्त राजवैद्य को दिखाया गया, लेकिन कोई फायदा नहीं हो पाया बच्चा वैसा का वैसा ही रहा।
भगवान श्रीकृष्ण वहीँ उपस्थित थे। उन्होंने कहा, “यदि इस बच्चे के सिर पर कोई ऐसा महात्मा या व्यक्ति या संत हाथ रख दे, जिसने अपने जीवन में कभी भी झूठ न बोला हो, तो यह बच्चा जीवित हो उठेगा। शर्त यह है कि यदि वह व्यक्ति संत अथवा महात्मा अपने जीवन में कभी भी झूठ बोला हो, तो यह बच्चा कभी जीवित नहीं होगा।”
राज्य में चारों तरफ ऐसे व्यक्ति की खोज की गई, मगर ऐसा कोई नहीं मिला, जिसने कभी झूठ न बोला हो। पांचों पांडवों में से अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव कहने लगे कि क्यों न भैया युधिष्ठिर ही इस बच्चे के ऊपर हाथ रख दें, क्योंकि वह तो सदैव सत्यवादी रहे हैं। युधिष्ठिर बोले, “मैं ऐसा खतरा नहीं उठा सकता, क्योंकि एक बार मैं भी महाभारत के युद्ध में ‛अश्वथामा’ को लेकर झूठ जैसा ही सत्य बोल चुका हूँ।”
यह सब सुन रहे श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि आपको कोई ऐसा सत्यवादी नहीं मिल रहा है, जो इस बच्चे के ऊपर हाथ रख दें और यह बच्चा जीवित हो जाए। तो क्या मैं एक बार प्रयास करके देख सकता हूं। युधिष्ठिर सहित पांचों पांडव बोलने लगे कि नहीं नहीं आप ऐसा मत कीजिए। आपने तो जीवन में झूठ ही झूठ बोला है। ऐसे में, बच्चा तो कभी भी जीवित नहीं होगा।
श्रीकृष्ण शांत रहे और कुछ देर बाद बोले कि क्या आपके पास कोई अन्य उपचार है। यदि उपचार नहीं है, तो मैं क्यों नहीं आप मुझे एक बार मौका देते हैं। पांडवों ने विचार-विमर्श कहा, “ठीक है आप अपना हाथ रख कर प्रयास कर लीजिए।”जैसा ही श्रीकृष्ण ने बच्चे के ऊपर अपना हाथ रखा, बच्चा जीवित हो उठा। तब श्रीकृष्ण पांडवों से बोले, “ हे पांडव, न तो मैं सत्य बोलता हूं और न ही असत्य बोलता हूं। लोकहित के लिए जो भी अच्छा होता है, मैं वही बोलता हूं और वही करता हूं।”
ऊं तत्सत...



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