2019 की ओर बढ़ते कदम और देश की वर्तमान सियासत संकेत दे रही है कि किसी भी दल का अपने बूते सत्ता में आना मुश्किल है। तो कुर्सी के लिए साथी या यूं कहें साथियों की जरूरत है, सो सभी अगल-बगल झांक रहे हैं और हर जगह मेल-बेमेल जोड़ी बनने की गुंजाइश तलाशी जा रही है। यही वजह है कि भाजपा नाराज सहयोगियों के लाख नखरे उठाकर भी उफ नहीं कर रही। वहीं, कांग्रेस, एनसीपी, बसपा, सपा, राजद, तेदेपा... यानी भाजपा बनाम महागठबंधन बनाने की कसरत कर्नाटक चुनाव के बाद चर्चा में ही नहीं आई, बल्कि मंच भी साझा किया गया। हालांकि, हालात फिर बदल रहे हैं, जिससे तीसरे मोर्चे की संभावना प्रबल हो रही है। इसके साथ ही ‛लोकसभा 2019’ में समीकरण मोदी बनाम राहुल की बजाय मोदी बनाम मायावती भी बनने लगे हैं।
किसकी “माया”
राजनीतिक गलियारे में नित नई चर्चाओं का दौर चल रहा है, जिसमें अब तक सबसे ज्यादा लोकप्रियता बसपा अध्यक्ष मायावती ने बटोरी है। चर्चाओं पर यकीन करें, तो सपा पहले ही बसपा से हाथ मिलाने की मंशा साफ कर चुकी है। कांग्रेस भी सपा की अपेक्षा मायावती की ओर देख रही है। वैसे भी, विगत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा से हाथ मिलाकर कांग्रेस को खास फायदा नहीं हुआ था। राजनीतिक सूझबूझ और वोट बैंक की बात करें, तो वहां भी बसपा वर्तमान परिस्थितियों में सपा पर बीस पड़ती दिख रही है। वैसे, मायावती ने अब तक सभी मुद्दों पर चुप्पी साध रखी है।
यूपी जीता, वही सिकंदर
दरअसल सभी राजनीतिक दल ये जानते हैं कि दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचना है, तो यूपी को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जिस दल ने इस राज्य में फतह हासिल कर ली, उसकी सरकार केंद्र में बननी तय है। खुद आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश को पहली रैली के लिए चुना था। 1977 में फुलबाग मैदान में इंदिरा दहाड़ीं और मजदूरों का शहर पंजे के साथ खड़ा हो गया और फिर से सत्ता इंदिरा गांधी के हाथों में आ गई। इसके बाद कई इलेक्शन हुए और जिस दल ने यूपी को जीता, वहीं दिल्ली का सिकंदर बना। इसी के तहत सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा की नजर उत्तर प्रदेश पर टिकी है। हाल ही में हुए तीन लोकसभा उपचुनाव से जो तस्वीर उभरी, उससे संकेत है कि उत्तर प्रदेश में मायावती और बसपा फिर मजबूत हो रहे हैं। साथ ही, देश की राजनीति में भी दलित वोटों की साध के लिए भी मायावती से अच्छा विकल्प तलाशना मुश्किल है।
दलितों पर मजबूत पकड़
यूपी में दलितों पर उनकी पकड़ को देखते हुए उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव मायावती को गठबंधन में 'बड़े पार्टनर' का दर्जा देने को तैयार दिखते हैं। उन्होंने खुद कई बार संकेत दिए हैं कि यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से गठबंधन होने पर ज्यादा सीटें वह बसपा को देने को तैयार हैं। कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियां भी मायावती से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय कदम बढ़ाने की पैरवी कर चुके हैं। कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के दौरान मंच पर बसपा सुप्रीमो मायावती को विशेष दर्जा मिलता दिखा, जब सोनिया गांधी के साथ उनके गले मिलने की तस्वीर आम हुई। उत्तर प्रदेश से बाहर भी बसपा लगातार विस्तार कर रही है। कर्नाटक में उनका इकलौता विधायक मंत्री भी बन चुका है। इससे पहले मध्यप्रदेश, उत्तराखंड व अन्य राज्यों में भी उनकी पार्टी के प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधायक बन चुके हैं। हाल यह है कि कांग्रेस भी बसपा से सीटों का समझौता करने को तैयार दिख रही है।
बहरहाल, जानकारों का कहना है कि मायावती के सपा के साथ हाथ मिलाने के आसार कम ही हैं, क्योंकि बसपा का वोटर तो सपा में ट्रांसफर हो जाएगा, लेकिन अखिलेश के मतदाता हाथी की बजाय अन्य दलों में जा सकते हैं। हां, यदि बसपा की जुगलबंदी भाजपा के साथ हो जाए, तो दलित-ब्राह्मण सहित गैर जाट वोट के साथ आने से पार्टी को मजबूती मिल सकती है।
कुल मिलाकर, मायावती जल्दबाजी में कोई फैसला लेने के मूड में नहीं दिख रही हैं, क्योंकि उनकी नजर 2019 के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव पर भी है। इसके अलावा विपक्षी एकता की राह में कई रोड़े हैं। तिस पर यदि ये बेमेल मेल बन भी गया, तब सबसे पहली कसरत जीत की होगी, उसके बाद प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए बसपा के पास इन घटक दलों के बीच सबसे ज्यादा सांसद होने चाहिए। फिलहाल, अभी दिल्ली दूर है और तब तक नित नए समीकरण बनते बिगड़ते रहेंगे।
■ सोनी सिंह



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