“गणित हो गयल गुरु” - Kashi Patrika

“गणित हो गयल गुरु”

नीतीश कुमार बिहार में “बड़े भाई” का सम्मान मांग रहे हैं। शिवसेना 2019 में चुनाव अकेले लड़ने का राग अलाप रही है। सुनकर एक बनारसी जुमला जेहन में आ गया “गणित हो गयल गुरु”।अब इसका ठीक-ठीक मतलब तो मेरी तरह कोई बनारसी ही समझ सकता है, लेकिन बात सिर्फ इतनी है कि 2019 रणभूमि में उतरने से पहले राज“नीति”क बिसात पर सभी अपनी-अपनी मुहरे मजबूत करने की जुगत में जुट गए हैं। नई-नई दोस्ती गांठी जा रही है। “दुश्मन” खेमे में जगह भी तलाशी जा रही है, क्योंकि सत्ता की संभावनाओं से चूकने का सीधा मतलब है पांच साल का लंबा बनवास। 

बिछने लगी बिसात
कर्नाटक में सत्ता साधना लामबंद विपक्ष के लिए जितना दिलचस्प नहीं था, उससे ज्यादा कैराना हड़पना रहा। हालिया उपचुनावों ने विपक्ष के आत्मविश्वास को मजबूत करने का काम किया, तो सरकारी खेमे में खलबली मचाने का। नतीजतन एनडीए के सहयोगी गाहे-बेगाहे आंखें तरेर रहे हैं। सोमवार को जेडीयू के तेवर भी तल्ख हो गए हैं। वक्त की नजाकत को समझते हुए नीतीश कुमार ने बिहार में जेडीयू को भाजपा का “बड़ा भाई” बताते हुए सीटों में बड़ी हिस्सेदारी मांग ली है। साथ ही बिहार में नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की मांग भी कर डाली है। इस बीच, सीट बंटवारे की राजनीति में लोजपा सांसद चिराग पासवान के बयान से मामला और दिलचस्प होता दिख रहा है। उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार का नेतृत्व मानाने से इनकार करते हुए कहा कि 2019 लोकसभा चुनाव में एनडीए का चेहरा पीएम मोदी ही होंगे। भाजपा भी स्थिति को भांपते हुए फिलहाल बैकफुट पर है और सहयोगियों के मान-मनौवल के मूड में दिख रही है।तभी नीतीश के ‛बड़ा भाई’ की बात को अस्वीकार नहीं किया, तो अमित शाह उद्धव से आज मुलाकात करेंगे।
सोमवार को नीतीश कुमार ने घोषणा कर दी कि बिहार में जेडीयू 2019 लोकसभा चुनावों में 25 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बाकी 15 सीटें सहयोगी भाजपा के लिए छोड़ने को तैयार है। खास यह भी है कि नीतीश कुमार ने भाजपा को भरोसे में लिए बिना ही एकतरफा घोषणा कर दी है, जबकि सात जून को एनडीए के सभी घटक दलों की बैठक पटना में होने वाली है। हालांकि, सीटों के इन आंकड़ों को अभी अंतिम नहीं कहा जा सकता, किंतु संकेत साफ है कि मोदी मैजिक फीका पड़ रहा है, सो साथी भी तोलमोल की गुंजाइश तलाश रहे हैं।

2014 लोकसभा का तालमेल
2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में एनडीए ने 31 सीटें जीती थी। एनडीए की 31 सीटों में से भाजपा को 22 सीटें, पासवान की एलजेपी को 6 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को 3 सीटें मिली थीं। वहीं, लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी को सिर्फ 4 सीट मिलीं, जबकि कांग्रेस और नीतीश कुमार के खाते में 2-2 सीटें आईं।


इतनी तल्खी क्यों!
2014 लोकसभा परिणामों पर गौर करें, तो नीतीश कुमार की तल्खी का मतलब समझना जरा मुश्किल है। लेकिन कर्नाटक के बाद उपचुनावों में भाजपा को मिली पटखनी और लामबंद विपक्ष के बढ़ते हौसले को देखते हुए इसे समझना आसान होगा।
वैसे भी, पिछली लोकसभा में दो सीटें जीतने वाली जेडीयू के अंदर पहले से ही इस बात की बेचैनी थी कि आखिर इस बार सीट-शेयरिंग फॉर्मूला क्या होगा? हालिया उपचुनावों में बिहार में हार के बाद जेडीयू के भीतर सीटों को लेकर चिंता और भी बढ़ गई थी, क्योंकि सीटों की सौदेबाजी उन्हें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ करनी होगी। लिहाजा दबाव की रणनीति के तहत जेडीयू ने 'बड़े भाई' का पासा फेंक दिया है। साथ ही इस बात की परख भी हो जाएगी कि जेडीयू सख्त हुई, तो क्या भाजपा दामन छोड़ सकती है?

अटकलों का बाजार गर्म
नीतीश का यह फैसला बिहार की सियासत में तेजस्वी यादव के बढ़ते कद को देखते हुए भी उठाया गया भी लगता है। जेडीयू यह कतई नहीं चाहती कि 2019 के आम चुनावों में वह भाजपा के सहयोगी के रूप में न दिखे। बिहार में जेडीयू का राजनीतिक भविष्य भाजपा के साथ से बिगड़ भी सकता है, सो नीतीश सम्भावनाओं की तलाश में जुट गए हैं। सियासी जानकार यहां तक कह रहे हैं कि नीतीश कुमार के पास भाजपा के अलावा फिलहाल विकल्प नहीं है, नहीं तो वे साथ छोड़ भी सकते हैं। सीटों की घोषणा के पहले भी नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा को लेकर नाराजगी जता चुके थे।
जेडीयू नेता अजय आलोक ने कहा, 'सीट शेयरिंग को लेकर जेडीयू में कोई कन्फ्यूजन नहीं है। हम अब तक 25 सीटों पर चुनाव लड़ रहे थे और भाजपा 15 सीटों पर, लेकिन अब कुछ सहयोगी पार्टियां भी हमसे जुड़ गई हैं। तो अब सीट शेयरिंग को लेकर सीनियर नेता फैसला करेंगे। बिहार में नीतीश कुमार ही एनडीए गठबंधन का चेहरा हैं।' फिलहाल, भाजपा ने भी नीतीश कुमार के बड़े भाई की भूमिका को अस्वीकारा नहीं है।

जेडीयू में भीतरी खींचतान
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो जेडीयू के भीतर भाजपा के साथ को लेकर खींचतान बना हुआ है। जेडीयू के कम से कम 50 फीसदी ऐसे विधायक हैं, जो भाजपा का साथ नहीं चाहते। इनमें से ज्यादातर विधायक ओबीसी और दलित हैं। कई विधायक भाजपा के साथ पर नीतीश कुमार को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं, लेकिन यह सब अभी दबी जुबान से है।

“यारी” न पड़ जाए भारी
भाजपा अगर नीतीश कुमार की बात मानती है, तो ऐसी हालत में अपने 7 सांसदों की सीट को त्याग देना पड़ेगा। ऐसे में पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उनकी शर्तें मानें ये मुश्किल है। वैसे भी, भाजपा भी नीतीश कुमार की राजनीतिक हालत को समझ रही है। सूत्रों की मानें तो महज 10 से 15 सीटें ही पार्टी जेडीयू के लिए छोड़ सकती है, क्योंकि बाकी सहयोगी दल भी हैं, जिनके लिए भी सीटें छोड़नी हैं। हालांकि, बिहार में 7 जून को एनडीए की बैठक होनी है। इस बैठक में अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों और सीट शेयरिंग को लेकर चर्चा होगी।
उधर, केंद्र की अन्य साझेदार भी भाजपा के लिए समय-समय पर मुसीबत पैदा करती रहते हैं। बात बिहार की हो रही है, तो पासवान और कुशवाहा की पार्टी
भी भाजपा के लिए टेढ़ी खीर है। वैसे, रामविलास पासवान और अमित शाह के बीच बीते रविवार हुई मुलाकात को भी बिहार की राजनीति में हो रहे घटनाक्रम से जोड़कर देखा गया था। दरअसल पिछले कुछ दिनों से पासवान भी “बिहार को विशेष राज्य” पर नीतीश कुमार के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे थे। बीच-बीच में कुशवाहा के आरजेडी के साथ जाने की खबरे आती रहती हैं। हालांकि, इन तीनों दलों की कवायद और तल्ख तेवर के पीछे माना जा रहा है कि 2019 चुनाव में सीट बंटवारे में अपना दमखम बढ़ाने की कोशिश हो सकती है।
भाजपा को अपने सहयोगियों की यारी अभी से भारी पड़ रही है। महाराष्ट्र में भी सत्ता में सहयोगी होते हुए शिवसेना लंबे समय से विपक्ष की भूमिका निभा रही है। शिवसेना ने पालघर उपचुनाव के बाद ईवीएम को लेकर भाजपा को कठघरे में खड़ा करने के बाद साथ छूटने का संकेत भी दे दिया। उद्धव ठाकरे ने कहा, “भाजपा को अब दोस्तों की जरूरत नहीं है। हम भविष्य में अकेले चुनाव लड़ेंगे।" भाजपा भी फिलहाल दोस्तों को नाराज करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। सूत्रों के मुताबिक आज अमित शाह उद्धव ठाकरे से मुलाकात करेंगे और सात जून को बिहार में एनडीए की बैठक होने वाली है, जिसमें सीटों का समीकरण बन सकता है।

महागठबंधन का राजनीतिक भविष्य कितना लंबा यह कहना मुश्किल है, किंतु इतना जरूर है कि विपक्ष के हाथ मिलाने से एनडीए में घबराहट है, तिस पर उपचुनावों में मिली हार, पेट्रोल के बढ़े दाम, बेरोजगारी जैसे सवालों पर घिरी भाजपा की नांव साथियों को ज्यादा सुरक्षित लग रही हो या नहीं, सौदेबाजी की गुंजाइश बनती दिख रही है।
■ सोनी सिंह




No comments:

Post a Comment