October 2018 - Kashi Patrika

सुख-दुख की आंख मिचौली

October 31, 2018 0
सुख-दुख की आंख मिचौली
सुख का अर्थ है: दुख गया, मगर राह देख रहा है किनारे पर खड़ा कि कब सुख से आपका छुटकारा हो, तो मैं फिर आऊं। कभी ज्यादा दूर नहीं जाता, लेकिन सुख-दुख दोनों को पार कर लें, तो आनंद ही आनंद है...

सुख में दुख ज्यादा दूर नहीं जाता। ऐसे दरवाजे के पास खड़ा हो जाता है निकलकर, ठीक है; आप थोड़ी देर सुख भोगो। फिर मैं आ जाऊं। सुख और दुख साथ-साथ हैं। आनंद का अर्थ है: दुख सदा को गया। और जब दुख ही चला गया सदा को, तो सुख भी चला गया सदा को। सुख-दुख का जोड़ा है। वे साथ-साथ हैं। आनंद तो एक परम शांति की दशा है-जहां न दुख सताता, न सुख सताता। जहां कोई सताता ही नहीं। जहां कोई उत्तेजना नहीं होती। सुख की भी उत्तेजना है।
■ ओशो

काशी सत्संग: वास्तविक शांति

October 31, 2018 0
काशी सत्संग: वास्तविक शांति

एक दिन एक साधु स्वामीजी के पास आया। वह चिंतित प्रतीत हो रहा था। अभिवादन करने के उपरांत उसने अपनी व्यथा स्वामीजी को सुनाई, “स्वामीजी! मुझे शांति नहीं मिलती। मैंने सब कुछ त्याग दिया है। मोह माया के बंधनों से मुक्त हो गया हूं। फिर भी मन सदा भटकता रहता है। एक दिन मैं अपने एक गुरु के पास गया। मेरी व्यथा सुनकर उन्होंने मुझे एक मंत्र दिया और कहा कि उसके जाप से मुझे अनहदनाद सुनाई देगा और मेरा मन शांत हो जाएगा। मैंने उस मंत्र का जाप करने पर भी मुझे शांति नसीब नहीं हुई। मैं बहुत परेशान हूं स्वामीजी। आप कुछ समाधान बताइए।” कहते हुए उस साधु की आंखें नम हो गई।
स्वामीजी बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहे थे। बात समाप्त होने पर उन्होंने पूछा, “मान्यवर! क्या आप वास्तव में शांति चाहते है?”
“जी स्वामीजी! इसी आस में मैं आपके पास आया हूं” साधू ने उत्तर दिया।
“तो ठीक है। मैं आपको शांति प्राप्त करने का सरल मार्ग बताता हूं। यह जान लो कि सेवा धर्म महान है। घर से निकलो। बाहर जाकर भूखों को भोजन दो। प्यासों को पानी पिलाओ। विद्यारहितों को विद्या दो। दीन-दुखियों, दुर्बलों और रोगियों की तन, मन एवं धन से सेवा करो। सेवा द्वारा मनुष्य का अंतःकरण शांत होता है। ऐसा करने से आपको सुख और शांति प्राप्त होगी।”
स्वामी विवेकानंद की बात साधु के मन में बैठ गई। वह एक नए संकल्प के साथ वहां से चला गया। उसे समझ आ गया था कि मानव जाति की निःस्वार्थ सेवा से ही मनुष्य को शांति प्राप्त हो सकती है।
ऊं तत्सत...

मन के पार

October 30, 2018 0
मन के पार
मन समस्या बन गया है, क्योंकि तुमने विचारों को अपने भीतर इतना गहरे ले लिया है कि तुम अंतराल को पूरी तरह से भूल गए हो। भूल गए कि वे आगंतुक हैं, वे आते हैं और जाते हैं...

मन का कोई अस्तित्व नहीं होता-पहली तो बात यह है, सिर्फ विचार होते हैं। दूसरी बात : विचार तुमसे अलग होते हैं, वे ऐसी वस्तु नहीं है, जो तुम्हारे स्वभाव के साथ एकाकार हो। वे आते हैं और चले जाते हैं। तुम बने रहते हो, तुम स्थिर होते हो। तुम ऐसे हो जैसे कि आसमान: यह कभी आता नहीं, कभी जाता नहीं, यह हमेशा यहां है। बादल आते हैं और जाते हैं, वे क्षणिक घटना हैं, वे अनंत नहीं हैं। तुम विचार को पकड़ने का प्रयास भी करो, तुम लंबे समय तक रोक नहीं सकते; उसे जाना ही होगा, उसकी अपनी जन्म और मृत्यु है। विचार तुम्हारे नहीं हैं, वे तुम्हारे नहीं होते हैं। वे आगंतुक की तरह आते हैं, लेकिन वे मेजबान नहीं हैं।
गहरे से देखो, तब तुम मेजबान बन जाओगे और विचार मेहमान हो जाएंगे। और मेहमान की तरह वे सुंदर हैं, लेकिन यदि तुम पूरी तरह से भूल जाते हो कि तुम मेजबान हो और वे मेजबान बन जाते हैं, तब तुम मुश्किल में पड़ जाते हो। यही नर्क है। तुम घर के मालिक हो, घर तुम्हारा है, और मेहमान मालिक बन गए हैं। उनका स्वागत करो, उनका ध्यान रखो, लेकिन उनके साथ तादात्म्य मत बनाओ; वर्ना वे मालिक बन जाएंगे।
मन समस्या बन गया है, क्योंकि तुमने विचारों को अपने भीतर इतना गहरे ले लिया है कि तुम अंतराल को पूरी तरह से भूल गए हो; भूल गए कि वे आगंतुक हैं, वे आते हैं और जाते हैं। हमेशा ध्यान रहे कि जो है वह तुम्हारा स्वभाव है, तुम्हारा ताओ। हमेशा उसके प्रति सजग रहो जो न कभी आता है न कभी जाता है, ऐसे ही जैसे आकाश। गेस्टाल्ट को बदलो: आगंतुक पर ध्यान मत दो, मेजबान के साथ बने रहो; आगंतुक आएंगे और जाएंगे।
■ ओशो

काशी सत्संग: “चार चौकीदार”

October 30, 2018 0
काशी सत्संग: “चार चौकीदार”

एक राजा था। उसके राज्य में कभी भी उपद्रव नहीं होते थे। प्रजा बहुत सुखी थी। उसके राज्य से सटा एक दूसरे राजा का छोटा-सा राज्य था, लेकिन उसमें आए दिन लड़ाई-झगड़े होते रहते थे। लोग आपस में लड़ते रहते थे। उसकी प्रजा बहुत ही दुखी थी, जिसकी वजह से राजा भी बहुत परेशान था।
एक दिन वह राजा दूसरे राजा के पास आकर बोला- "मेरा छोटा-सा राज्य है, पर उसमें आए दिन उत्पात होते रहते हैं। आपका राज्य इतना बड़ा है, फिर भी यहां पूर्ण शांति है, इसका कारण क्या है?"
राजा हंसते हुए बोला- "आप ठीक कहते हैं। मेरे राज्य में बड़ा चैन है। उसका कारण यह है कि मैंने अपने यहां चार चौकीदार तैनात कर रखे हैं, जो हर घड़ी मेरी रक्षा करते रहते हैं।"
दूसरे राजा ने आश्चर्य से पूछा- "बस चार, मेरे यहां तो चौकीदारों की फौज है, पर इसका कोई फायदा नहीं, फिर आपका काम चार चौकीदारों से कैसे चल जाता है?"
राजा बोला- "जी, मेरे रक्षक दूसरी तरह के हैं।"
कैसे? दूसरे राजा ने उत्सुकता से पूछा।
राजा ने उत्तर दिया- "पहला रक्षक है सत्य। वह मुझे असत्य नहीं बोलने देता।"
और दूसरा?
राजा बोला- "दूसरा है प्रेम। वह मुझे घृणा से बचाता है।"
तीसरा?
राजा बोला- "तीसरा है न्याय। वह मुझे अन्याय नहीं करने देता।"
और चौथा?
राजा ने गंभीर होकर कहा- "चौथा है त्याग। वह स्वार्थी होने से मेरी रक्षा करता है।" राजा की शंका का समाधान हो गया। जिस राजा के सत्य, प्रेम, न्याय और त्याग, जैसे चौकीदार होते हैं, उसे कोई परेशानी नहीं हो सकती।
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये॥
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं, सीतासमारोपितवामभागम।
पाणौ महासायकचारूचापं, नमामि रामं रघुवंशनाथम॥
ऊं तत्सत...

जीवन आनंद है

October 29, 2018 0
जीवन आनंद है
जीवन बहुत सरल है, वह एक आनंदपूर्ण नृत्य है। पूरी पृथ्वी खुशी और नृत्य से सराबोर हो सकती है, लेकिन तुम्हें पहले अपने अंदर जमा कचरा बाहर फेंकना पड़ेगा...

ध्यान से शुरू करो और चीजें तुम्हारे भीतर विकसित होने लगेंगी। मौन, शांति,आनंद, संवेदनशीलता। और ध्यान से जो भी आता है उसे जीवन में लाने का प्रयास करो। उसे बांटो, क्योंकि जिसे भी बांटा जाता है वह तेजी से विकसित होता है। और जब तुम मृत्यु के बिंदु पर आते हो, तुम जान जाओगे कि कोई मृत्यु नहीं होती। तुम विदा ले सकते हो, उदासी के आंसू गिराने की जरूरत नहीं है; हां, खुशी के आंसू अवश्य हो सकते हैं, लेकिन दुख के नहीं। लेकिन तुम्हें शुरुआत निर्दोषिता से करनी होगी।
तो पहले तो पूरा कचरा बाहर फेंक दो, जिसे तुम ढो रहे हो। हर व्यक्ति इतना कूड़ा कर्कट ढो रहा है, और हैरानी होती है, किसलिए? सिर्फ इसलिए कि लोग तुम्हें बता रहे हैं कि ये महान अवधारणाएं हैं, सिद्धान्त हैं? तुम अपने साथ बुद्धिमानी से पेश नहीं आते हो। अपने साथ बुद्धिमानी रखो।
जीवन बहुत सरल है, वह एक आनंदपूर्ण नृत्य है। पूरी पृथ्वी खुशी और नृत्य से सराबोर हो सकती है, लेकिन ऐसे लोग हैं, जिनका स्वार्थ इसमें निहित है कि कोई भी जीवन का आनंद न लें। कोई मुस्कुराए न, कोई हंसे न और कि जिंदगी एक पाप है, एक सजा है। जब ऐसा माहौल हो कि तुमसे निरंतर यही कहा गया है कि यह एक सजा है, तो तुम आनंद कैसे ले सकते हो? कहा जाता है कि तुम इसलिए पीड़ा भोग रहे हो, क्योंकि तुमने गलत काम किए हैं और यह एक तरह की कैद है जिसमें तुम्हें कष्ट उठाने के लिए डाला गया है।
मैं तुमसे कहता हूं कि जिंदगी एक कैद नहीं है, एक सजा नहीं है। वह एक पुरस्कार है और वह उन्हीं को दिया जाता है जो उसके लायक हैं। इसे भोगना तुम्हारा हक है; यदि तुम नहीं भोगते हो तो वह पाप होगा। यदि तुम उसे सुंदर नहीं बनाते, उसे वैसा ही छोड़ते हो जैसा तुम्हें मिला था तो यह अस्तित्व के खिलाफ होगा। नहीं, उसे थोड़ा और प्रसन्न, थोड़ा और सुंदर, थोड़ा और सुगंधित बनाकर छोड़ो।
■ सौजन्य से: ओशो इंटरनेशनल न्यूज  लेटर

काशी सत्संग: प्रभु की गोद

October 29, 2018 0
काशी सत्संग: प्रभु की गोद

एक व्यक्ति बहुत नास्तिक था। उसको भगवान पर विश्वास नहीं था। एक बार उसके साथ एक दुर्घटना घटित हुई। वह सड़क पर पड़ा-पड़ा सबकी ओर कातर निगाहों से मदद के लिए देख रहा था, पर 'कलियुग का इंसान किसी की मदद जल्दी नहीं करता' यही सोच कर थक गया। तभी उसके नास्तिक मन ने अनमने से प्रभु को गुहार लगाई। उसी समय एक ठेले वाला वहां से गुजरा उसने उसको गोद में उठाया और चिकित्सा हेतु ले गया। उसने व्यक्ति के परिवार वालों को फोन किया और अस्पताल बुलाया। सभी आए और ठेले वाले को बहुत धन्यवाद दिया। उसके घर का पता भी लिखवा लिया, 'जब यह ठीक हो जाएंगे, तो आप से मिलने आएंगे' का वादा किया। कुछ दिन बाद वह सज्जन ठीक हो गए और उन्होंने अपने परिवार के साथ उस व्यक्ति से मिलने का इरादा बनाया।
फिर वह निकल पड़े, अपने मददगार से मिलने। वो बांके बिहारी का नाम पूछते हुए उस पते पर जाते हैं, तो वहां उनको  प्रभु का मंदिर मिलता है। वो अचंभित से उस भवन को देखते है और उसके अन्दर चले जाते जाते हैं। अभी भी वहां पर पुजारी से नाम लेकर पूछते हैं कि "यह बांके बिहारी कहां मिलेगा?" पुजारी हाथ जोड़ मूर्ति की ओर इशारा करके कहता है कि यहां यही एक बांके बिहारी हैं।
खैर, वो मंदिर से लौटने लगते हैं, तो उनकी निगाह एक बोर्ड पर पड़ती है उस पर एक वाक्य लिखा दिखता है- "इंसान ही इंसान के काम आता है, उससे प्रेम करते रहो, मैं तो तुम्हें स्वयं मिल जाऊंगा"।
ऊं तत्सत...

“ध्यान किसलिए करें?”

October 27, 2018 0
“ध्यान किसलिए करें?”
ठीक पूछा है। क्योंकि हम तो हर बात के लिए पूछेंगे कि किसलिए? कोई कारण हो पाने के लिए तो ठीक है, कुछ दिखाई पड़े कि धन मिलेगा, यश मिलेगा, गौरव मिलेगा, कुछ मिलेगा, तो फिर हम कुछ कोशिश करें। क्योंकि जीवन में हम कोई भी काम तभी करते हैं ,जब कुछ मिलने को हो... 

हमारी आदत है, ऐसा कोई काम करने के लिए कोई राजी नहीं होगा, जिसमें कहा जाए कि कुछ मिलेगा नहीं और करो। वह कहेगा, फिर मैं पागल हूं क्या? कि जब कुछ मिलेगा नहीं और मैं करूं।नलेकिन मैं आपसे निवेदन करता हूं, जीवन में वे ही क्षण महत्वपूर्ण हैं, जब आप कुछ ऐसा करते हैं जिसमें कुछ भी मिलता नहीं। यह मैं फिर से दोहराऊं, जीवन में वे ही क्षण महत्वपूर्ण हैं, जब आप कुछ ऐसा करते हैं, जिसमें कुछ मिलता नहीं। जब कुछ मिलने के लिए आप करते हैं तब बहुत क्षुद्र हाथ में आता है। विराट को पाने के लिए कुछ पाने की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हो तो फिर बाधा हो जाएगी।
ध्यान किसलिए करते हैं? अगर कोई आपसे पूछे, प्रेम किसलिए करते हैं? तो क्या कहेंगे? कहेंगे, प्रेम स्वयं अपने आप आनंद है। वह किसी के लिए नहीं, कोई परपज नहीं है और आगे। प्रेम अपने में ही आनंद है। उसके बाहर और कोई कारण नहीं जिसके लिए प्रेम करते हों। और अगर कोई किसी कारण से प्रेम करता हो तो हम फौरन समझ जाएंगे कि गड़बड़ है, यह प्रेम सच्चा नहीं है।
मैं आपको इसलिए प्रेम करता हूं कि आपके पास पैसा है, वह मिल जाएगा। तो फिर प्रेम झूठा हो गया। मैं इसलिए प्रेम करता हूं कि मैं परेशानी में हूं, अकेला हूं, आप साथी हो जाएंगे। वह प्रेम झूठा हो गया। वह प्रेम न रहा। जहां कोई कारण है वहां प्रेम न रहा, जहां कुछ पाने की इच्छा है वहां प्रेम न रहा। प्रेम तो अपने आप में पूरा है।
ठीक वैसे ही, ध्यान के आगे कुछ पाने को जब हम पूछते हैं—क्या मिलेगा? वह हमारा लोभ पूछ रहा है। मोक्ष मिलेगा कि नहीं? आत्मा मिलेगी कि नहीं? वह पूछ रहा है हमारा लोभ। वही जो हमारी हमेशा लाभ, लोभ की जो चिंतना है, वह काम कर रही है। नहीं, मैं आपसे कहता हूं, कुछ भी नहीं मिलेगा। और जहां कुछ भी नहीं मिलता वहीं वह मिल जाता है, सब कुछ जिसे हम कहें। जिसे हमने कभी खोया नहीं, जिसे हम कभी खो नहीं सकते, जो हमारे भीतर मौजूद है। अगर उसको पाना हो जो हमारे भीतर मौजूद है तो कुछ और पाने की चेष्टा सार्थक नहीं हो सकती है। सब पाने की चेष्टा छोड़ कर जब हम मौन, चुप रह जाएंगे, तो उसके दर्शन होंगे जो हमारे भीतर निरंतर मौजूद है। कुछ वहां मौजूद है, उसे पाने के लिए अक्रिया में हो जाना जरूरी है, सारी क्रियाएं छोड़ कर अक्रिया में हो जाना जरूरी है।
अगर मुझे आपके पास आना हो, तो दौड़ना पड़ेगा, चलना पड़ेगा। और अगर मुझे मेरे ही पास आना हो तो फिर कैसे दौडूंगा और कैसे चलूंगा? और अगर कोई आदमी कहे कि मैं अपने को ही पाने के लिए दौड़ रहा हूं, तो हम उससे कहेंगे, तुम पागल हो, दौड़ने में तुम समय खराब कर रहे हो। दौड़ने से क्या होगा? दौड़ते हैं दूसरे तक पहुंचने के लिए, अपने तक पहुंचने के लिए कोई दौड़ना नहीं होता। फिर? अपने तक पहुंचने के लिए सब दौड़ छोड़ देनी होती है।
क्रिया होती है, कुछ पाने के लिए, लेकिन जिसे स्वयं को पाना है उसके लिए कोई क्रिया नहीं होती, सारी क्रिया छोड़ देनी होती है। जो क्रिया छोड़ कर, दौड़ छोड़ कर रुक जाता, ठहर जाता, वह स्वयं को उपलब्ध हो जाता है। और यह स्वयं को उपलब्ध कर लेना सब उपलब्ध कर लेना है। और जो इसे खो देता है वह सब पा ले तो भी उसके पाने का कोई मूल्य नहीं। एक दिन वह पाएगा वह खाली हाथ था और खाली हाथ है। अज्ञान की स्थिति में सिवाय ध्यान के कोई और मार्ग नहीं है, और ध्यान अज्ञान का कृत्य नहीं है।
■ ओशो

काशी सत्संग:“भलाई”

October 27, 2018 0
काशी सत्संग:“भलाई”

अनाश्रित: कर्म फलं कार्यं कर्म करोति य:
स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चा क्रिया।
भावार्थ : जो पुरुष कर्म फल की इच्छा का त्याग कर सदैव शुभ कर्म करता रहता है, परोपकार ही जिसके जीवन का ध्येय है, वही सच्चा सन्यासी है। कर्मों का त्याग सन्यास नहीं, अपितु अशुभ कर्मों का त्याग सन्यास है। दुनिया का त्याग करना सन्यास नहीं है, अपितु दुनिया के लिए त्याग करना यह अवश्य सन्यास है।

एक आदमी ने एक पेंटर को अपने घर बुलाया और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो। पेंटर ने नाव को पेंट कर दिया, फिर अपने पैसे लिए और चला गया। अगले दिन, नाव का मालिक पेंटर के घर पहुंच गया और उसे एक बहुत बड़ी धनराशी दिया। पेंटर भौंचक्का हो गया। उसने पूछा - ये किस बात के पैसे हैं? मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिया था! मालिक ने कहा- ये पेंट का पैसा नहीं है, बल्कि ये उस नाव में जो "छेद" था, उसको रिपेयर करने का पैसा है। पेंटर ने कहा- अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे, ठीक नहीं लग रहा है।
मालिक ने कहा- दोस्त, तुम समझे नहीं मेरी बात! अच्छा मैं विस्तार से समझाता हूं। मैंने तुम्हें नाव पेंट करने के लिए कहा तो जल्दबाजी में उस छेद के बारे में बताना भूल गया। जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे उस नाव को समुद्र में लेकर नौकायन के लिए निकल गए। मैं उस वक्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर नौकायन पर निकल गए हैं! तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है। मैं भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे। लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे। अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो। फिर मैंने छेद देखा, तो पता चला कि मेरे बताए बिना तुम उसको ठीक कर चुके हो। मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं।
जीवन में "भलाई का कार्य" जब मौका मिले हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो! क्योंकि कभी-कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है।
ऊं तत्सत...

स्वार्थ से परे हो मित्रता...

October 26, 2018 0
स्वार्थ से परे हो मित्रता...
कौन तुम्हारा मित्र है? किसको तुम अपना मित्र कहते हो, क्योंकि सभी अपने स्वार्थों के लिए जी रहे हैं! जिसको तुम मित्र कहते हो, वह भी अपने स्वार्थ के लिए तुमसे जुड़े हैं, और तुम भी अपने स्वार्थ के लिए उनसे जुड़े हो...

अगर मित्र वक्त पर काम न आए, तुम्हारी अपेक्षा के अनुरूप हो, तो तुम मित्रता तोड़ देते हो! बुद्धिमान लोग कहते हैं मित्र तो वही, जो वक्त पर काम आए! लेकिन क्यों? वक्त पर काम आने का मतलब है कि जब मेरे स्वार्थ की जरूरत हो, तब वह सेवा को तत्पर रहे। लेकिन दूसरा भी यही सोचता है कि जब तुम वक्त पर काम आओ, तब मित्र हो! लेकिन तुम काम में लाना चाहते हो दूसरे को यह कैसी मित्रता है? तुम मित्रता के नाम पर दूसरे का शोषण करना चाहते हो, यह कैसा संबंध है?
तुम्हारे सब संबंध स्वार्थ के हैं। इतना ध्यान रहे कि तुम्हारे पास सब कुछ हो पर कोई ऐसा न हो, जिसके साथ तुम उसे बाँट सको, शेयर कर सको। कोई ह्रदय के इतना करीब नहीं की, जिससे अपने सुख-दुःख, भाव-आवेग बांट सको, तो तुम उस कुंए के सामान हो, जिसमें से कोई एक बाल्टी पानी निकलने वाला भी नहीं है। जल्दी ही तुम सड़ोगे, धीरे-धीरे तुम्हारे आनंद के स्रोत बंद हो जाएंगे, तुम एक गंदे पानी के डावरे होकर रह जाओगे। निस्वार्थ मित्रता के संबंध तुम्हें जीवंत रखते हैं। तुम्हारे स्रोत खुले रहते हैं।
■ ओशो

काशी सत्संग: श्रद्धा और समर्पण

October 26, 2018 0
काशी सत्संग: श्रद्धा और समर्पण

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा।
दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी, लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।
वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका, वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब-करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। अब दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा- क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है। बाघ ने गुर्राते हुए कहा- “मैं तो जंगल का राजा हूं, मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।”
गाय ने कहा- लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है। इस पर उस बाघ ने कहा- तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो, तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है। गाय ने मुस्कुराते हुए कहा- बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा, तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा। और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा। और फिर थोड़ी ही देर में सच में एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक-दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।
यहां गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है। और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है। किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए।
ऊं तत्सत...

तृषा गई एक बूंद से...

October 25, 2018 0
तृषा गई एक बूंद से...
जीवन सत्य में है और मनुष्य असत्य में भटक रहा है। जीवन वर्तमान में है और तू भूत-भविष्य में अटका है। इसी लिए जीवन दुखमय बन गया है...

मेरे प्रिय आत्मन्! सत्य की खोज के संबंध में थोड़ी सी बात आपसे कहना चाहूंगा। सत्य की क्या परिभाषा है? आज तक कोई परिभाषा नहीं हो सकी है। भविष्य में भी नहीं हो सकेगी। सत्य को जाना तो जा सकता है, लेकिन कहा नहीं जा सकता। परिभाषाएं शब्दों में होती हैं और सत्य शब्दों में कभी भी नहीं होता। लाओत्से ने आज से कोई तीन हजार वर्ष पहले एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम है ‛ताओ तेह किंग’। उस किताब की पहली पंक्ति में उसने लिखा है: मैं सत्य कहने के लिए उत्सुक हुआ हूं, लेकिन सत्य नहीं कहा जा सकता है। और जो भी कहा जा सकता है, वह सत्य नहीं होगा। फिर भी मैं लिख रहा हूं, लेकिन जो भी मेरी इस किताब को पढ़े, वह पहले यह बात ध्यान में रख ले कि जो भी लिखा, पढ़ा, कहा जा सकता है, वह सत्य नहीं हो सकता।
बहुत अजीब सी बात से यह किताब शुरू होती है। और सत्य की दिशा में लिखी गई किताब हो, और पहली बात यह कहे कि जो भी लिखा जा सकता है वह सत्य नहीं होगा, जो भी कहा जा सकता है वह सत्य नहीं होगा, फिर लिखा क्यों जाए? फिर कहा क्यों जाए? जो हम भी कहेंगे वह अगर सत्य नहीं होना है, तो हम कहें क्यों?
लेकिन जिंदगी के रहस्यों में से एक बात यह है कि अगर मैं अपनी अंगुली उठाऊं और कहूं-वह रहा चांद! तो मेरी अंगुली चांद नहीं हो जाती है, लेकिन चांद की तरफ इशारा बन सकती है। मेरी अंगुली पकड़ ले और कहे कि मिल गया चांद, तो भूल हो जाएगी, जो अंगुली को छोड़ दें और चांद को देखें, तो अंगुली इशारा बनेगी, बाधा नहीं।
शब्द सत्य नहीं है, न हो सकता है,लेकिन शब्द इशारा बन सकता है।
आंख खुलनी चाहिए, जिसकी आंख खुल जाती है वह जान लेता है। और जानते ही जीवन दूसरा हो जाता है। सत्य को जानते ही जीवन सत्य हो जाता है। सत्य को बिना जाने जीवन असत्य ही रहता है, चाहे हम कितने ही उपाय करें। अगर वह प्रेम भी प्रकट करे तो असत्य होगा। अगर वह अहिंसक भी बन जाए, तो भीतर हिंसा होगी। अगर वह प्रेमी भी बन जाए तो पीछे वासना होगी, अगर वह ब्रह्मचर्य भी साधे तो चित्त में सेक्स ही चलता रहेगा। सत्य को जाने बिना सारा का सारा जीवन ही असत्य होता है, चाहे हम कुछ भी करें। अंधा आदमी कुछ भी करे, टकराएगा। आंख वाला आदमी नहीं टकराएगा। नहीं टकराना आंख वाले के लिए उतना ही स्वाभाविक है, जितना अंधे के लिए टकराना। सत्य की उपलब्धि जीवन का रूपांतरण है, वह जीवन को सत्य कर जाती है। और जीवन जब तक सत्य नहीं है, तब तक आनंद भी नहीं है। असत्य के साथ कोई आनंद नहीं है, अंधेपन के साथ कोई आनंद नहीं है। अंधापन ही दुख है, असत्य ही दुख है।
लेकिन क्या करें फिर सत्य की खोज में?
जीवन को बदलने की बात मैं नहीं करता। जीवन को देखने की दृष्टि बदलने की बात है। और वह दृष्टि जितनी ताजी, साफ, पक्षपातरहित, दृष्टिमुक्त दृष्टि, शास्त्र-शब्द से मुक्त, अतीत से मुक्त, अभी और यहां जो है उसे देखने की जितनी निर्मलता हम साधते चले जाएं, उतनी ही वह आंख खुलेगी। वह आंख खुलेगी और हम उसे जान लेंगे जो है। जो है, उसी का नाम सत्य है।
■ ओशो

काशी सत्संग: "अलौकिक न्याय"

October 25, 2018 0
काशी सत्संग: "अलौकिक न्याय"

एक रोज एक महात्मा अपने शिष्य के साथ भ्रमण पर निकले। गुरुजी को ज्यादा इधर-उधर की बातें करना पसंद नहीं था। कम बोलना और शांतिपूर्वक अपना कर्म करना ही गुरु को प्रिय था परन्तु शिष्य बहुत चपल था। उसे दूसरों की बातों में बड़ा ही आनंद मिलता था। चलते हुए जब वे तालाब के पास से होकर गुजर रहे थे, तो देखा कि एक मछुआरे ने नदी में जाल डाल रखा है।
शिष्य यह देख खड़ा हो गया और मछुआरे को ‘अहिंसा परमो धर्म’ का उपदेश देने लगा। मछुआरे ने उसे अनदेखा किया, लेकिन शिष्य तो उसे हिंसा के मार्ग से निकाल लाने को उतारू ही था।
शिष्य और मछुआरे के बीच इसे लेकर झगड़ा होने लगा। यह देख गुरुजी शिष्य को लेकर आगे बढ़ गए और समझाया- बेटा हम जैसे साधुओं का काम सिर्फ समझाना है, लेकिन ईश्वर ने हमें दंड देने के लिए धरती पर नहीं भेजा है। शिष्य ने पूछा- हमारे राजा को तो बहुत से दंड के बारे में पता ही नहीं, तो आखिर इस हिंसक प्राणी को दंड कौन देगा? गुरू ने कहा- तुम निश्चिंत रहो, इसे भी दंड देने वाली एक अलौकिक शक्ति इस दुनिया में मौजूद है, जिसकी पहुंच सभी जगह है। ईश्वर की दृष्टि सब तरफ है और वह सब जगह पहुंच जाते हैं।
शिष्य गुरुजी की बात सुनकर संतुष्ट हो गया। इस बात के दो वर्ष बाद एक दिन गुरुजी और शिष्य दोनों उसी तालाब से होकर गुजरे। शिष्य अब दो साल पहले की वह मछुआरे वाली घटना भूल चुका था। उन्होंने उसी तालाब के पास देखा कि एक घायल सांप बहुत कष्ट में था। उसे हजारों चीटियां नोच-नोच कर खा रही थीं। शिष्य ने यह दृश्य देखा और उससे रहा नहीं गया। दया से उसका ह्रदय पिघल गया। वह सर्प को चींटियों से बचाने के लिए जाने ही वाला था कि गुरुजी ने उसके हाथ पकड़ लिए और उसे जाने से मना करते हुए कहा- बेटा! इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो। यदि अभी तुमने इसे बचाया, तो इस बेचारे को फिर से दूसरे जन्म में यह दुःख भोगने होंगे, क्योंकि कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। शिष्य ने पूछा- गुरुजी इसने ऐसा कौन-सा कर्म किया है, जो इस दुर्दशा में यह पड़ा है?
गुरुजी बोले- यह वही मछुआरा है, जिसे तुम इसी स्थान पर मछली न मारने का उपदेश दे रहे थे और वह तुम्हारे साथ लड़ने को उतारू था। वे मछलियां ही चींटियां हैं, जो इसे नोच-नोचकर खा रही हैं।
यह सुनते ही आश्चर्य में भरे शिष्य ने कहा- यह तो बड़ा ही विचित्र न्याय है।
गुरुजी बोले- बेटा! इसी लोक में स्वर्ग-नरक के सारे दृश्य मौजूद हैं। हर क्षण तुम्हें ईश्वर के न्याय के नमूने देखने को मिल सकते हैं। चाहे तुम्हारे कर्म शुभ हो या अशुभ उसका फल तुम्हें भोगना ही पड़ता है, इसलिए ही वेद में भगवान ने उपदेश देते हुए कहा है कि अपने किए कर्म को हमेशा याद रखो, यह विचारते रहो कि तुमने क्या किया है, क्योंकि तुमको वह भोगना पड़ेगा। जीवन का हर क्षण कीमती है। इसे बुरे कर्मों में व्यर्थ न करो. अपने खाते में हमेशा अच्छे कर्मों की बढ़ोत्तरी करो क्योंकि जैसे कर्म होंगे वैसा ही फल मिलेगा।
ऊं तत्सत...

निंदा में विद्वता

October 24, 2018 0
निंदा में विद्वता
तुम यदि सत्य की, ईश्वर की बात करोगे, तो उसे सिद्ध करना कठिन होगा। किंतु यदि नकारात्मक वक्तव्य दो, निंदा करो, तो उसे कोई असिद्ध नहीं कर सकेगा। इसी लिए लोग निंदा करते हैं, क्योंकि इसे प्रमाणित नहीं करना पड़ता... 

तुर्गनेव की प्रसिद्ध कथा है: “महामूर्ख”। एक गांव में एक महामूर्ख था। वह बहुत परेशान था, क्योंकि वह कुछ भी कहता लोग हंस देते। वह महामूर्ख मान लिया गया था, तो वह कभी ठीक भी बात कहता तो भी लोग हंस देते। वह सिकुड़ा—सिकुड़ा जीता था, बोलता तक नहीं था। न बोले तो लोग हंसते थे, बोले तो लोग हंसते थे। कुछ करे तो लोग हंसते थे, न करे तो लोग हंसते थे।
एक दिन गांव में एक फकीर आए। महामूर्ख ने फकीर के चरण पकड़े और कहा कि मुझे कुछ आशीर्वाद दो, मेरी जिंदगी क्या ऐसे ही बीत जायेगी सिकुड़े-सिकुड़े? क्या मैं महामूर्ख की तरह ही मरूंगा, कोई उपाय नहीं है कि थोड़ी बुद्धि मुझमें आ जाए? फकीर ने कहा उपाय है, यह ले सूत्र, तू निंदा शुरू कर दे।
उसने कहा : निंदा से क्या होगा? फकीर ने कहा. सात दिन तू कर और फिर मेरे पास आना। महामूर्ख ने पूछा- करना क्या है निंदा में? फकीर ने कहा- कोई कुछ भी कहे, तू नकारात्मक वक्तव्य देना। जैसे कोई कहे कि देखो, कितना सुंदर सूरज निकल रहा है! तू कहना इसमें क्या सुंदर है? सिद्ध करो, सुंदर कहां है? रोज निकलता है, अरबों-खरबों सालों से निकल रहा है। आग का गोला है, सुंदर क्या है? कोई कहे कि देखो, जीसस के वचन कितने प्यारे हैं! तू तत्क्षण टूट पड़ना कि क्या है इसमें प्यारा, कौन-सी बात खूबी की है, कौन-सी बात नई है? हर बात पर नकार ही करना। तू हर-एक से प्रमाण मांगना और खयाल रखना यह कि हमेशा नकार में रहना। सात दिन बाद आ जाना।
सात दिन बीत गए। महामूर्ख अबकी बार फकीर के पास अकेला नहीं आया, उसके कई शिष्य हो गए थे। वह आगे-आगे आ रहा था। फूल-मालाएं उसके गले में डली थीं। उसने फकीर से कहा कि तरकीब काम कर गई! गांव में एकदम सन्नाटा खिंच गया है, जहां निकल जाता हूं लोग सिर नीचा कर लेते हैं। लोगों में खबर पहुंच गई है कि मैं महामेधावी हूं। मेरे सामने कोई जीत नहीं सकता। अब आगे क्या करना है?
फकीर बोले- अब आगे तो कुछ करना ही मत, बस तू इसी पर रुके रहना। अगर तेरे को मेधा बचानी है, कभी विधेय में मत पड़ना। ईश्वर की कोई कहे तो तत्क्षण, तत्क्षण नास्तिकता प्रकट करना। जो भी कहा जाए, तू हमेशा नकारात्मक वक्तव्य देना, तुझे कोई न हरा सकेगा; क्योंकि नकारात्मक वक्तव्य को असिद्ध करना बहुत कठिन है। विधायक वक्तव्य को सिद्ध करना बहुत कठिन है।
ईश्वर को स्वीकार करने के लिए बड़ी बुद्धिमत्ता चाहिए, बड़ी सूक्ष्म संवेदना चाहिए। हृदय का अत्यंत जागरूक रूप चाहिए। चैतन्य की निखरी हुई दशा चाहिए। भीतर थोड़ी रोशनी चाहिए। लेकिन ईश्वर को इंकार करने के लिए कुछ भी नहीं चाहिए। कोई अनिवार्यता नहीं है, ईश्वर को इंकार करने के लिए। इसी लिए लोग दुनिया में निंदा करते हैं।
■ ओशो

काशी सत्संग: अच्छाई और बुराई

October 24, 2018 0
काशी सत्संग: अच्छाई और बुराई

“एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन को अपने पास बुलाया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि मुझे दस बुरे व्यक्ति का नाम लिख कर दो, नाम उनके लिखना जो तुमको बुरे लगते हों। फिर उन्होंने दुर्योधन से कहा कि तुम मुझे दस ऐसे व्यक्तियों का नाम लिखकर दो, जो तुम्हें अच्छे लगते हैं। और इसके लिए भगवान ने कुछ समय
निर्धारित कर दिया। समय पूरा होने पर दोनों ने असमर्थता जताते हुए भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। श्रीकृष्ण ने इसका कारण पूछा, तो ऐसा अर्जुन बोले, “भगवन, मुझे कोई बुरा नहीं दिख रहा, सब में कुछ न कुछ अच्छाई है।” और दुर्योधन बोला, “भगवन कोई भी अच्छा नहीं है, सब में कुछ न कुछ बुराई है।” भगवान श्रीकृष्ण की इस परीक्षा का तात्पर्य यह है कि अर्जुन स्वयं अच्छे हैं, इसलिए उन्हें कोई बुरा नहीं दिखता। इसके विपरीत दुर्योधन के खुद का मन साफ नहीं है, जिससे उसे सबमें कुछकुछ न कुछ बुराई दिखती है। पहले स्वयं का मन साफ करो, दुर्गुणों का त्याग करो, फिर सारा जग अच्छा दिखेगा।
ऊं तत्सत...

परमात्मा कहां नहीं है!

October 23, 2018 0
परमात्मा कहां नहीं है!
अपने जीवन को परमात्मा को ऐसे समर्पित कर दो कि हर तरफ सिर्फ वो ही रहे। सिर्फ अच्छा-अच्छा उसे मत दिखाना, अपना बुरा भी उसके लिए खोल देना। तुम्हारे क्रोध में भी उसकी ही याद हो। और तुम्हारे प्रेम में भी उसकी ही याद हो...

एक कहानी है कि गुरु नानक मक्का के पवित्र पत्थर की तरफ पैर करके सो गए थे। इससे पुजारी नाराज हुए और कहा, “हटाओ पैर यहां से। साधु होकर इतनी भी समझ नहीं है?” बात सुनकर नानक ने कहा, “आप हमारे पैर वहां कर दें, जहां परमात्मा न हो।” कहानी आगे कहती है कि पुजारियों ने उनके पैर सब दिशाओं में किए, जहां भी पैर किए, काबा का पत्थर वहीं हटकर पहुंच गया। कहानी सच हो न हो, पर कहानी में बड़ा सार है।
“जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता जहां पर खुदा न हो।”
सार इतना ही है कि पुजारी ऐसी कोई जगह न बता सके, जहां परमात्मा न हो। तुम्हारा जीवन ऐसा भर जाए उससे की ऐसी कोई जगह न बचे जहां वह न हो! इसी लिए बुरे-भले का हिसाब मत रखना। अच्छा-अच्छा उसे मत दिखाना, अपना बुरा भी उसके लिए खोल देना। तुम्हारे क्रोध में भी उसकी ही याद हो। और तुम्हारे प्रेम में भी उसकी ही याद हो। और तुम सब हैरान होओगे कि तुम्हारा क्रोध क्रोध न रहा, तुम्हारे क्रोध में भी उसकी सुगंध आ गई; और तुम्हारा प्रेम तुम्हारा प्रेम न रहा, तुम्हारे प्रेम में भी उसकी ही प्रार्थना बरसने लगी। तुम जिस चीज से परमात्मा को जोड़ दोगे, वही रूपांतरित हो जाती है। तुम अपना सब जोड़ दो, तुम्हारा सब रूपांतरित हो जाएगा...!
■ ओशो

काशी सत्संग: "शिल्पकार गृहिणी"

October 23, 2018 0
काशी सत्संग: "शिल्पकार गृहिणी"

असज्जनः सज्जनसङ्गिसङ्गात्करोति दुःसाध्यमपि साध्यं। 
पुष्पाश्रयाच्छंभुशिरोSधिरूढा पिपीलिका चुम्बति चन्द्रबिम्बम्।।
भावार्थ : साधारण या दुष्ट व्यक्ति भी सज्जन व्यक्तियों के साथ प्रयत्न पूर्वक रह कर अत्यन्त कठिन या असंभव कार्य को भी वैसे ही सम्पन्न कर लेते हैं, जैसे कि एक छोटी सी चींटी भी एक पुष्प का आश्रय लेकर भगवान् शिव (की मूर्ति) के मस्तक पर स्थित चन्द्रबिम्ब को चूमने में समर्थ हो जाती है। 

एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गए और जमींदार के घर नौकरी में लगते गए।
सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे। बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी। उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। नई बहू को देखने के लिए भीड़ जमा हुई। सबके चले जाने के बाद जब बहू ने घूंघट उठाकर अपनी ससुराल को देखा, तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छह चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले, पर अब यहीं उसकी जिंदगी थी। थोड़ी देर वह रोती रही, फिर मन को शांत किया। पड़ोस में रहने वाली बूढ़ी अम्मा के घर से जरूरी सामान लाकर घर को साफ किया। उसके बाद बहू ने एक चूल्हा छोड़ बाकी फोड़ दिए। फिर उसने सभी पोटलियों के चने एक साथ किए और अम्मा के घर जाकर चना पीसा। अम्मा ने उसे साग और चटनी भी दी। वापस आकर बहू ने चने के आटे की रोटियां बनाई और इन्तजार करने लगी।
जग्गू और उसके लड़के जब लौटे, तो एक ही चूल्हा देख भड़क गए। चिल्लाने लगे कि इसने तो आते ही सत्यानाश कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सबका चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से  निकली। बोली–आप लोग हाथ-मुंह धोकर बैठिये, मैं खाना निकालती हूं। सब अचकचा गए! हाथ-मुंह धोकर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा–रोटी,साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक-एक रोटी और गुड़ दिया।
चलते समय जग्गू से उसने पूछा– बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है, पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं। आसान रहता है खाने में। बहू ने समझाया कि सब अलग-अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिए भी कुछ लकड़ी लाने को कहा। बहू सबकी मजदूरी के अनाज से एक-एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी।
एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे। जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी-कभी बस्ती में आया करता था। आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू प्रणाम किया, तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आएगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन देते झोंपड़ी के दायें-बायें, तो एक कोठरी बन जाती।
बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला–ठीक है, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ। औरत चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! देश, समाज, और घर को औरत ही गढ़ती है।
ऊं तत्सत...

मैं और ‛मैं’ का भेद

October 22, 2018 0
मैं और ‛मैं’ का भेद
जीवन का तनाव और द्वंद्व 'मैं' और 'न-मैं' के विरोध से पैदा होता है। यही मूल चिंता और दुख है। जो इस द्वंद्व को पार कर लेता है, वह प्रभु में प्रविष्ट हो जाता है...

एक युवक ने पूछा, ''परमात्मा को पाने के लिए मैं क्या करूं?'' मैंने कहा, '''मैं' को शून्य कर लो या पूर्ण कर लो।'' वह कुछ समझा नहीं और एक कहानी उससे कहनी पड़ी- किसी समय दो फकीरों का मिलन हुआ। उन दोनों के सैकड़ों शिष्य भी उनके साथ थे। और यह भी सर्वविदित था कि उनके विचार बिलकुल विरोधी हैं। पहले फकीर ने दूसरे से पूछा, ''मित्र, जीवन की खोज में क्या तुमने पाया? जहां तक मेरा सवाल है, मैंने तो 'मैं' को खो दिया है। वह धीरे-धीरे हारता गया और अब बिलकुल मिट गया है। उसकी अब कोई रेखा भी बाकी नहीं है। 'मैं' नहीं, अब तो 'वही' बाकी है। सब है- लेकिन 'मैं' नहीं हूं। सब 'उसकी' ही मर्जी है। और 'उसकी' धरा में मात्र बहे जाना- न-कुछ होकर मात्र जीए जाना- कैसा आनंद है! जो पाना था, वह मैंने पा लिया और जो होना था, वह मैं हो गया हूं। ओह! 'मैं' के मिट जाने में कितनी शक्ति है, कितनी शांति है और कितना सौंदर्य है।'' यह सुनकर दूसरा बोला, ''मित्र मैं तो 'मैं' हो गया हूं। मैं ही हूं अब और कुछ नहीं है। सब कुछ मैं ही हूं। 'मैं' के बाहर जो है, वह नहीं है। 'अहं ब्रह्मास्मि'। चांद और तारे 'मैं' ही चलाता हूं, मैं ही सृष्टिं को बनाता और मिटाता हूं। सृष्टि का यह सारा खेल मेरा ही संकल्प है। और, मित्र, ' मैं ' की इस विजय में कितना आनंद है, कितनी शांति है, कितना सौंदर्य है!''
उन दोनों के शिष्य इन बातों को सुन बहुत हैरानी में पड़ गए। और उस समय तो उनकी उलझन का ठिकाना न रहा, जब बिदा होते वे दोनों फकीर एक दूसरे को बांहों में लेकर कह रहे थे, ''हम दोनों के अनुभव बिलकुल समान हैं। कितने विरोधी मार्गो से चलकर हम एक ही सत्य पर पहुंच गए हैं।''
'मैं' शून्य हो, तो पूर्ण हो जाता है। शून्य और पूर्ण एक ही हैं। जो शून्य से चलता है, वह निर्वाण पर पहुंचता है। और, जो पूर्ण से चलता है, वह ब्रह्म पर। लेकिन, निर्वाण और ब्रह्म क्या एक ही अवस्था के दो नाम नहीं हैं!
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

काशी सत्संग: कर्म फल से मुक्ति नहीं

October 22, 2018 0
काशी सत्संग: कर्म फल से मुक्ति नहीं

एक समय कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था। चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो मिलता चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी कि उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा!
वज्र चुराए हुए धन को सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था! एक रात वीरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली। और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की भांति ढक दिया। लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकालता की चोर को इस चोरी का पता ही नहीं चल पाता था।
एक दिन लकड़हारा अपनी पत्नी को धन देते हुए बोला कि तुम रोज धन मांगा करती थी, लो आज पर्याप्त धन इक्कठा हो गया है। उसकी पत्नी को धन के बारे में पता चला तो, उसने कहा, “जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो, वह स्थाई नहीं होता है। इसी लिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिए।”
वीरदत्त को भी ये बात जंच गई। उसने उस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया, जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था। लेकिन इसमें सीढ़िया लगनी रह गई थी और सारे पैसे समाप्त हो गए थे। तो वह फिर से छिपकर चोर का अनुसरण करने लगा कि वह धन कहा छुपाता है। इसके बाद फिर उससे दसवां हिस्सा निकाल कर तालाब का काम पूरा करवाया! वीरदत्त ने चोर के धन से भगवान शंकर और भगवान विष्णु के भव्य मंदिर बनवाए। बंजर जमीन को खेती योग्य बनवाकर गरीबों में वितरित कर दिया।
गरीबों ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसका नाम द्विजवर्मा रखा। जब द्विजवर्मा की मृत्यु हुई, तब एक ओर से यमदूत आए और एक ओर से भगवान शंकर के गण आए। उनमें आपस में विवाद होने लगा। इसी बीच वहां नारद जी पधारे। नारद जी ने उनको समझाया, आप विवाद न करें इस लकड़हारे ने चोरी के धन से परोपकार के कर्म किए हैं, इसलिए जब तक यह कुमार्ग से अर्जित धन का प्रायश्चित नहीं कर लेता, तब तक वायु रूप में अंतरिक्ष में विचरण करता रहेगा।
नारद जी की बात सुनकर सभी दूत वापस लौट गए तथा द्विजवर्मा बारह वर्षों तक प्रेत बनकर घूमता रहा।
नारद जी ने लकड़हारे की पत्नी से कहा, तुम ने अपने पति को सदमार्ग दिखाया है तुम ब्रह्मलोक जाओगी। किंतु, लकड़हारे की पत्नी अपने पति के दुःख से दुखी थी। वह देवर्षि से बोली, जब तक मेरे पति को देह नहीं मिलती, तब तक मैं यही रहूंगी। जो गति मेरे पति की हुई वही गति मैं भी चाहती हूं! उसकी बात सुनकर देवर्षि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि तुम अपने पति की मुक्ति के लिए शिव की आराधना करो। द्विजवर्मा की पत्नी ने अपने पति की मुक्ति के लिए अथक मेहनत से भगवान शिव की आराधना की। इससे सारा पाप धुल गया और दोनों पति-पत्नी को उत्तम लोक मिला। इस पौराणिक कथा का निष्कर्ष यही है की कोई भला काम करने का अच्छा फल जरूर मिलता है,लेकिन कोई भला काम करने के लिए कभी किसी गलत काम का सहारा नहीं लेना चाहिए। अन्यथा उस गलत काम का भी दंड जिंदा रहते या मरने के बाद जरूर भुगतना पड़ता है!
ऊं तत्सत...

“यहां सब अजनबी हैं”

October 21, 2018 0
“यहां सब अजनबी हैं”
दोस्त-मित्र, पति-पत्नी...सब, एक-दूसरे से अजनबी हैं और तुम इसी सच को झुठला रहे हो। तुम्हें अपने अकेलेपन को स्वीकारना होगा, जिसे तुम किसी भी तरह से टाल नहीं सकते...

तुम्हें इस सत्य को स्वीकारना होगा कि तुम अकेले हो। हो सकता है कि तुम भीड़ में होओ, पर तुम अकेले जी रहे हो; हो सकता है कि अपनी पत्नी के साथ, प्रेमिका के साथ, प्रेमी के साथ, लेकिन वे अपने अकेलेपन के साथ अकेले हैं। तुम अपने अकेलेपन के साथ अकेले हो, और ये अकेलेपन एक-दूसरे को छूते भी नहीं हैं, एक-दूसरे को कभी भी नहीं छूते हैं।
हो सकता है कि तुम किसी के साथ बीस साल, तीस साल, पचास साल रहते हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, तुम अजनबी बने रहोगे। हमेशा और हमेशा तुम अजनबी होओगे। इस तथ्य को स्वीकारो कि हम यहां पर अजनबी हैं; कि हम नहीं जानते कि तुम कौन हो, कि हम नहीं जानते कि मैं कौन हूं। मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं कौन हूं, तो तुम कैसे जान सकते हो? लेकिन लोग अनुमान लगा लेते हैं कि पत्नी को पति के बारे में पता होना चाहिए, पति यह अनुमान लगा लेता है कि पत्नी को पति का पता होना चाहिए। सभी इस तरह से बर्ताव कर रहे हैं जैसे कि सभी को मन पढ़ने वाला होना चाहिए, और इसके पहले कि तुम कहो, तुम्हारी जरूरत को, तुम्हारी समस्याओं को उसे समझना चाहिए। उसे समझना चाहिए--और उन्हें उस बारे में कुछ करना चाहिए। अब यह सारी बातें नासमझी हैं।
तुम्हें कोई नहीं जानता, तुम भी नहीं जानते, इसलिए अपेक्षा मत करो कि सभी को तुम्हें जानना चाहिए; चीजों की प्रकृति के अनुसार यह संभव नहीं है। हम अजनबी हैं। शायद संयोगवश हम साथ हैं, लेकिन हमारा अकेलापन होगा ही। इसे मत भूलो, क्योंकि तुम्हें इसके ऊपर कार्य करना होगा। सिर्फ वहां से तुम्हारी मुक्ति, तुम्हारा मोक्ष संभव है। लेकिन तुम इससे ठीक उल्टा कर रहे हो : कैसे अपने अकेलेपन को भूलो? प्रेमी, प्रेमिका, सिनेमा चले जाओ, फुटबाल मैच देखो; भीड़ में खो जाओ, डिस्को में नाचो, स्वयं को भूल जाओ, लेकिन किसी भी तरह से अपने अकेलेपन को, अपने सचेतन मन तक मत आने दो--और सारा रहस्य यहीं पर है।
तुम्हें अपने अकेलेपन को स्वीकारना होगा, जिसे तुम किसी भी तरह से टाल नहीं सकते। और इसके स्वभाव को बदलने का कोई मार्ग नहीं है। यह प्रामाणिक वास्तविकता है। यही तुम हो।
■ ओशो

काशी सत्संग: प्रभु श्रीराम के पत्थर डूब गए

October 21, 2018 0
काशी सत्संग: प्रभु श्रीराम के पत्थर डूब गए

लंका विजय के लिए समुद्र पर पुल बनाया जा रहा था। सुग्रीव की वानर सेना इस कार्य में लगी हुई थी। बड़े और विशाल पत्थरों को ढो कर लाया जा रहा था और समुद्र पर पुल बनाने के लिए डाला जा रहा था। ये पत्थर पानी में डूब नहीं रहे थे, बल्कि तैर रहे थे।
प्रभु श्रीराम भी यह देख रहे थे और यह सोचते हुए कि उन्हें भी अपना योगदान देना चाहिए। उन्होंने कुछ पत्थर उठाए और समुद्र में डाले। परंतु उनके द्वारा डाले गए पत्थर समुद्र में डूब गए। उन्होंने कई बार प्रयास किए, परंतु उनके द्वारा समुद्र में डाले गए पत्थर डूब ही जाते थे। जबकि तमाम उत्साहित वानर सेना द्वारा डाले गए पत्थर डूबते नहीं थे। श्रीराम थोड़े परेशान हो गए कि आखिर माजरा क्या है! हनुमान जी बड़ी देर से प्रभु को यह कार्य करते देख रहे थे और मंद ही मंद मुस्कुरा रहे थे। अचानक श्रीराम की नजर उन पर पड़ी। हनुमान जी ने कहा- “हे प्रभु! जिसको आपने छोड़ दिया, उसे कौन बचाएगा? उसे तो डूबना ही है।”
ऊं तत्सत...

स्वार्थी बनो और देखो

October 20, 2018 0
स्वार्थी बनो और देखो
मैं स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता। मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं, क्योंकि जिसने स्वार्थ साध लिया, उससे परार्थ सधता है। जिससे स्वार्थ ही न सधा, उससे परार्थ कैसे सधेगा! जो अपना न हुआ, वह किसी और का कैसे होगा...

स्वार्थ शब्द बड़ा प्यारा है, लेकिन गलत मायने में लिया जाता है। स्वार्थ का अर्थ होता है-आत्मार्थ। अपना सुख, स्व का अर्थ। तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता। मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं, क्योंकि जिसने स्वार्थ साध लिया, उससे परार्थ सधता है। जिससे स्वार्थ ही न सधा, उससे परार्थ कैसे सधेगा! जो अपना न हुआ, वह किसी और का कैसे होगा! जो अपने को सुख न दे सका, वह किसको सुख दे सकेगा! इसके पहले कि तुम दूसरों को प्रेम करो, मैं तुम्हें कहता हूं, अपने को प्रेम करो। इसके पहले कि तुम दूसरों के जीवन में सुख की कोई हवा ला सको, कम से कम अपने जीवन में तो हवा ले आओ। इसके पहले कि दूसरे के अंधेरे जीवन में प्रकाश की किरण उतार सको, कम से कम अपने अंधेरे में तो प्रकाश को निमंत्रित करो। इसको स्वार्थ कहते हो! चलो स्वार्थ ही सही, शब्द से क्या फर्क पड़ता है! लेकिन यह स्वार्थ बिलकुल जरूरी है। यह दुनिया ज्यादा सुखी हो जाए, अगर लोग ठीक अर्थों में स्वार्थी हो जाएं। और जिस आदमी ने अपना सुख नहीं जाना, वह जब दूसरे को सुख देने की कोशिश में लग जाता है तो बड़े खतरे होते हैं। उसे पहले तो पता नहीं कि सुख क्या है? वह जबर्दस्ती दूसरे पर सुख थोपने लगता है, जिस सुख का उसे भी अनुभव नहीं हुआ। तो करेगा क्या? वही करेगा जो उसके जीवन में हुआ है।
मनुष्य स्वार्थ को धन, पद, भवन से जोड़कर देखते हैं और सब पाकर भी  स्वार्थ हल नहीं होता! सुख नहीं मिलता, क्योंकि स्वयं का मिलन भी नहीं होगा। और न जीवन में कोई अर्थवत्ता आएगी। तुम्हारा जीवन व्यर्थ ही रहेगा, कोरा, जिसमें कभी कोई वर्षा नहीं हुई। जहां कभी कोई अंकुर नहीं फूटे, कभी कोई हरियाली नहीं और कभी कोई फूल नहीं आए। तुम्हारी वीणा ऐसी ही पड़ी रह जाएगी, जिसमें कभी किसी ने तार नहीं छेड़े। कहां का अर्थ और कहां का स्व! तुमने जिसको स्वार्थ समझा है, उसमें स्वार्थ नहीं है, सिर्फ मूढ़ता है। और जिसको तुम स्वार्थ कहकर कहते हो कि कैसे मैं करूं? मैं तुमसे कहता हूं, उसमें स्वार्थ है और परम समझदारी का कदम भी है। तुम यह स्वार्थ करो।
इस बात को तुम जीवन के गणित का बहुत आधारभूत नियम मान लो कि अगर तुम चाहते हो दुनिया भली हो, तो अपने से शुरू कर दो-तुम भले हो जाओ। फिर तुम कहते हो, 'परमात्मा मुझे यदि मिले भी, तो उससे अपनी शांति मांगने के बजाय मैं उन लोगों के लिए दंड ही मांगना पसंद करूंगा जिनके कारण संसार में शोषण है, दुख है और अन्याय है।' क्या तुम सोचते हो तुम उन लोगों में सम्मिलित नहीं हो? क्या तुम सोचते हो वे लोग कोई और लोग हैं? तुम उन लोगों से भी तो पूछो कभी! वे भी यही कहते हुए पाए जाएंगे कि दूसरों के कारण। कौन है दूसरा यहां? किसकी बात कर रहे हो? किसको दंड दिलवाओगे? तुमने शोषण नहीं किया है? तुमने दूसरे को नहीं सताया है? तुमने वही सब किया है, मात्रा में भले भेद हो। हो सकता है तुम्हारे शोषण की प्रक्रिया बहुत छोटे दायरे में चलती हो, लेकिन चलती है। यह सारा जाल जीवन का शोषण का जाल है, इसमें तुम एकदम बाहर नहीं हो, दंड किसके लिए मांगोगे? और जरा खयाल करना, दंड भी तो दुख ही देगा दूसरों को! तो तुम दूसरों को दुखी ही देखना चाहते हो! परमात्मा भी मिल जाएगा तो भी तुम मांगोगे दंड ही! दूसरों को दुख देने का उपाय ही! तुम अपनी शांति तक छोड़ने को तैयार हो!
(सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर)

काशी सत्संग: प्रभु की सीख

October 20, 2018 0
काशी सत्संग: प्रभु की सीख

एक भिखारी था। उसे ठीक से खाने-पीने तक को नहीं मिलता था, जिस वजह से उसका बूढ़ा शरीर सूखकर कांटा हो गया था। उसकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी। उसकी आंखों की ज्योति चली गई थी। उसे कोढ़ हो गया था। बेचारा रास्ते के एक ओर बैठकर गिड़गिड़ाते हुए भीख मांगा करता था। एक युवक उस रास्ते से रोज गुजरता था। भिखारी को देखकर उसे बड़ा बुरा लगता। उसका मन बहुत ही दुखी होता। वह सोचता, वह क्यों भीख मांगता है? जीने से उसे मोह क्यों है? भगवान उसे उठा क्यों नहीं लेते?
एक दिन उससे न रहा गया। वह भिखारी के पास गया और बोला- बाबा, तुम्हारी ऐसी हालत हो गई है, फिर भी तुम जीना चाहते हो? तुम भीख मांगते हो, पर ईश्वर से यह प्रार्थना क्यों नहीं करते कि वह तुम्हें अपने पास बुला ले?
भिखारी ने उत्तर दिया- भैया तुम जो कह रहे हो, वही बात मेरे मन में भी उठती है। मैं भगवान से बराबर प्रार्थना करता हूं, पर वह मेरी सुनता ही नहीं। शायद वह चाहता है कि मैं इस धरती पर रहूं, जिससे दुनिया के लोग मुझे देखें और सबक लें कि एक दिन मैं भी उनकी ही तरह था, लेकिन वह दिन भी आ सकता है, जब वे मेरी तरह हो सकते हैं। इसी लिए किसी को घमंड नहीं करना चाहिए।
लड़का भिखारी की ओर देखता रह गया। उसने जो कहा था, उसमें कितनी बड़ी सच्चाई समाई हुई थी। यह जिंदगी का एक कड़वा सच था, जिसे मानने वाले प्रभु की सीख भी मानते हैं।
ऊं तत्सत...

हम ही स्वर्ग, हम ही नरक!

October 19, 2018 0
हम ही स्वर्ग, हम ही नरक!
व्यक्ति जो अपने अंतस में होता है, उसे ही अपने बाहर भी पाता है। बाह्य, आंतरिक का प्रक्षेपण है। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग है। और, भीतर नरक हो, तो बाहर नरक...

किसी ने पूछा : ''स्वर्ग और नरक क्या हैं?'' मैंने कहा, ''हम स्वयं!'' एक बार किसी शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, ''मैं जानना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक कैसे हैं?'' उसके गुरु ने कहा, ''आंखें बंद करो और देखो।'' उसने आंखें बंद की और शांत शून्यता में चला गया। फिर, उसके गुरु ने कहा, ''अब स्वर्ग देखो।'' और थोड़ी देर बाद कहा, ''अब नरक!'' जब उस शिष्य ने आंखें खोली थीं, तो वे आश्चर्य से भरी हुई थीं। उसके गुरु ने पूछा, ''क्या देखा?'' वह बोला, ''स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी  लोग चर्चा करते हैं। न ही अमृत की नदियां थीं और न ही स्वर्ण के भवन थे- वहां तो कुछ भी नहीं था और नरक में भी कुछ नहीं था। न ही अग्नि की ज्वालाएं थी और न ही पीड़ितों के रुदन। इसका कारण क्या है? क्या मैंने स्वर्ग नरक देखें या नहीं देखे।'' उसका गुरु हंसने लगा और बोला, ''निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नरक देखें हैं, लेकिन अमृत की नदियां और स्वर्ण के भवन या कि अग्नि की ज्वाला और पीड़ा का रुदन तुम्हें स्वयं ही वहां ले जाने होते हैं। वे वहां नहीं मिलते। जो हम अपने साथ ले जाते हैं, वही वहां हमें उपलब्ध हो जाते हैं। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नरक हैं।''
व्यक्ति जो अपने अंतस में होता है, उसे ही अपने बाहर भी पाता है। बाह्य, आंतरिक का प्रक्षेपण है। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग है। और, भीतर नरक हो, तो बाहर नरक। स्वयं में ही सब कुछ छिपा है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

काशी सत्संग: “हरि बिन राखनहार ना कोई”

October 19, 2018 0
काशी सत्संग: “हरि बिन राखनहार ना कोई”

एक ब्राह्मण भगवान का बड़ा भक्त था।  भगवान को भोग लगाए बिना अन्न का दाना तक मुंह में नहीं डालता था। घर में कुछ आए, तो भगवान को अर्पित करता फिर उसका उपयोग करता। ब्राह्मण की अनन्य भक्ति से उसकी पत्नी काफी चिढ़ती थी। एक दिन उसकी पत्नी गुस्से में बोली, “तुम जो इतना करते हो, क्या सचमुच भगवान खाते हैं? हर चीज तुम मंदिर लेकर पहुंच जाते हो, अबकी बार भगवान को खिलाए बिना मत लौटना।”
ब्राह्मण के मन में पत्नी की बात लग गई। उसने प्रण किया कि आज कुछ हो जाये, वो भगवन को बिना खिलाए नहीं लौटेगा। वह मंदिर  पहुंचा। भगवान के सामने लड्डू की थाली रख दी और प्रार्थना करने लगा प्रभु भोग स्वीकार कर लें। एक पहर बीत, दूसरे पहर को आई, लेकिन भगवान नहीं आए। हां! कुछ चीटियां, मक्खियां जरूर आ गईं। ब्राह्मण की नजर कुछ कुत्तों पर गई, जो लड्डू पर नजर गड़ाए थे। इतने में वहां कुछ भिखारी आ गए। उनमें से एक ने तो हिम्मत करके लड्डू को उठा भी लिया, लेकिन ब्राम्हण ने उसे भी भगा दिया। ब्राह्मण भगवान की बाट जोहता रहा, किंतु प्रभु तो आने का नाम ही नहीं ले रहे थे। रात होने को आई, पर भगवान नहीं आए, तब ब्राह्मण को गुस्सा आ गया। उसने लड्डू की थाली मंदिर के बाहर फेंक दी और घर आ गया।
पत्नी ने उसे देखकर बीवी ने पूछा, “भगवान को खिलाकर आ गए।” ब्राह्मण उत्तर दिए बिना बिस्तर पर जाकर सो गया। रात में उसके स्वप्न में भगवान आए और बोले, “हे ब्राह्मण लड्डू बहुत ही स्वादिष्ट थे, लेकिन थोड़ी मिट्टी लग गई थी। मैं तो सुबह से ही इंतजार कर रहा था, कभी चींटी, तो कभी भिखारी बनकर आया, मगर लड्डू नहीं मिले। अंत में ही मिला तो सही।” भक्त और भगवान के अनूठे रिश्ते पर रहीम ने बड़ी अच्छी बात कही है-
“दिव्य दीनता के रसहिं, का जाने जग अंधु
भली बिचारी दीनता, दीनबंधु से बंधु॥”
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: सच्ची सुंदरता

October 18, 2018 0
काशी सत्संग: सच्ची सुंदरता

एक बार एक राज्य के राजा ने घोषणा   करा दी कि जिसके हाथ सबसे सुंदर होंगे, उनको इनाम मिलेगा। घोषणा के बाद से राज्य में सभी अपने हाथों की देखभाल में लग गए। कोई दिन में चार बार हाथ धोता, कोई हल्दी-चन्दन का लेप लगाता। कइयों ने तो काम करना बिलकुल ही बंद कर दिया।                     फिर निर्णय का दिन आ पहुंचा। सभी राज दरबार में इनाम जीतने की लालसा लिए पहुंचे। सभी को अपने हाथ आगे करके पंक्ति में खड़े होने को कहा गया। सभी अपने हाथ आगे करके खड़े  हो गए। अब सबके हाथों की जाँच शुरू हुई। तभी एक बच्ची भागी भागी आई और कतार में हाथ आगे कर के खड़ी हो गई। बच्ची बोली, “माफ कर दें महाराज! खेत से आने में थोड़ी देर हो गई। राजा ने सभी का हाथ देखा फिर अपना निर्णय सुनाया कि इस प्रतियोगिता की विजेता वो लड़की है।  सबमें कोतुहल मच गया कि ऐसा कैसे हो सकता है? उसके हाथ तो गंदे हैं और खुरदुरे भी हैं। फिर भी पुरष्कार उसको कैसे मिल गया।
राजा सब समझ गए, तब उन्होंने कहा, “मेरा निर्णय कोई गलत नहीं है। हाथों की सच्ची सुंदरता उसके काम करने में है।” यह सुनकर सबको अपनी गलती का अहसास हुआ और लोगों ने लड़की को जीत की बधाई दी। मित्रों, प्रभु ने मनुष्य का निर्माण कर्म के लिए किया है, लेकिन कुछ लोग इस बात को समझ नहीं पाते। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है-
“अपहाय निजं कर्म कृष्ण कृष्णेति वादिनः। 
ते हरेद्वेंषिणः पापाः धर्मार्थे जन्म यद्वरेः॥”
ऊं तत्सत...

“मनुष्य अपने जीवन का कलाकार है”

October 17, 2018 0
“मनुष्य अपने जीवन का कलाकार है”
जीवन एक कला है और मनुष्य अपने जीवन का कलाकार भी है और कला का उपकरण भी। वह अपने को जैसा गढ़ता है, वैसा ही अपने को पाता है...

मनुष्य को प्रतिक्षण और प्रतिपल नया कर लेना होता है। उसे अपने को ही जन्म देना होता है। स्वयं के सतत जन्म की इस कला को जो नहीं जानते हैं, वे जानें कि वे कभी के मर चुके हैं।
रात्रि कुछ लोग आए। वे पूछने लगे, ''धर्म क्या है?'' मैंने उनसे कहा, ''धर्म मनुष्य के प्रभु में जन्म की कला है। मनुष्य में आत्म-ध्वंस और आत्म-स्रजन की दोनों ही शक्तियां हैं। यही उसका स्वयं के प्रति उत्तरदायित्व है। उसका अपने प्रति प्रेम विश्व के प्रति प्रेम का उद्भव है। वह जितना स्वयं को प्रेम कर सकेगा, उतना ही उसके आत्मघात का मार्ग बंद होता है। और, जो-जो उसके लिए आत्मघाती है, वही-वही ही औरों के लिए अधर्म है। स्वयं की सत्ता और उसकी संभावनाओं के विकास के प्रति प्रेम का अभाव ही पाप बन जाता है। इस भांति पाप और पुण्य, शुभ और अशुभ, धर्म और अधर्म का स्रोत उसके भीतर ही विद्यमान है- परमात्मा में या अन्य किसी लोक में नहीं। इस सत्य की तीव्रता और गहरी अनुभूति ही परिवर्तन लाती है और उस उत्तरदायित्व के प्रति हमें सजग करती है, जो कि मनुष्य होने में अंतर्निहित है। तब, जीवन मात्र जीना नहीं रह जाता। उसमें उदात्त तत्वों का प्रवेश हो जाता है और हम स्वयं का सतत सृजन करने में लग जाते हैं। जो इस बोध को पा लेते हैं, वे प्रतिक्षण स्वयं को ऊ‌र्ध्व लोक में जन्म देते रहते हैं। इस सतत सृजन से ही जीवन का सौंदर्य उपलब्ध होता है, जो कि क्रमश: घाटियों के अंधकार और कुहासे से ऊपर उठकर हमारे हृदय की आंखों को सूर्य के दर्शन में समर्थ बनाता है।''
जीवन एक कला है। और, मनुष्य अपने जीवन का कलाकार भी है और कला का उपकरण भी। जो जैसा अपने को बनाता है, वैसा ही अपने को पाता है। स्मरण रहे कि मनुष्य बना-बनाया पैदा नहीं होता। जन्म से तो हम अनगढ़े पत्थरों की भांति ही पैदा होते हैं। फिर, जो कुरूप या सुंदर मूर्तियां बनती हैं, उनके सृष्टा हम ही होते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

काशी सत्संग: दयालु प्रभु

October 17, 2018 0
काशी सत्संग: दयालु प्रभु

भगवान श्रीकृष्ण का एक अनन्य भक्त था। बड़ी लगन से उनकी सेवा-पूजा करता था। एक दिन उसने भगवान से कहा, “प्रभु मैं आपकी इतनी सेवा करता हूं, पूजा करता हूं, तो प्रभुजी कम से कम एक बार तो दर्शन दीजिए। अगर दर्शन नहीं तो कुछ ऐसा कीजिए जिससे मुझे आभास हो आप मेरे साथ हैं।” श्रीकृष्ण ने उसे स्वप्न में आकर कहा कि अब से तुम जब समंदर किनारे टहलोगे तुम्हें चार पैरों के निशान दिखाई देंगे। दो तुम्हारे होंगे और दो मेरे। ऐसा ही हुआ, जब वो समंदर किनारे चलता तो उसे चार पैरों के निशान दिखाई देते। उसे ये देख के काफी अच्छा लगता। रोज वो ऐसा करने लगा।
कुछ दिनों बाद अचानक उसका व्यापार डूब गया। उसके सभी मित्रों, परिजनों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब वो समंदर किनारे चलता तो उसे सिर्फ दो ही पैर दिखाई देते। उसे इस बात से बहुत तकलीफ हुई कि बुरे वक्त में तो लोगों ने मेरा साथ छोड़ा ही भगवान ने भी  छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद फिर सब कुछ ठीक हो गया। उसका व्यापार भी चलने लगा, तो फिर उसे दो की जगह चार पैरों के निशान दिखने लगे।
भक्त ने श्रीकृष्ण की प्रार्थना की और कहा,“ हे प्रभु! मुझे इस बात का बुरा नहीं लगा की मेरे अपनों ने बुरे वक्त में मेरा साथ छोड़ दिया, लेकिन आपने भी मुझे छोड़ दिया।” उस रात उसके स्वप्न में द्वारिकाधीश आए और बोले, “तुम्हें जो दो पैरों के निशान संकट की घड़ी में दिखाई देते थे, वो तुम्हारे नहीं मेरे थे। मैंने तुम्हें गोद में उठा रख था। जब तुम्हारा बुरा वक्त समाप्त हो गया, तो मैंने तुम्हें गोद से नीचे उतार दिया।”
ऊं तत्सत...

जीवन दर्शनशास्त्र की कक्षा नहीं है...

October 16, 2018 0
जीवन दर्शनशास्त्र की कक्षा नहीं है...
विचारों में जीना, भ्रांतियों में जीने का एक ढंग है। तब लाखों प्रश्न हैं और लाखों उत्तर। प्रत्येक प्रश्न फिर और सैकड़ों प्रश्न ले आता है और इसका कोई अंत नहीं है। लेकिन जीने का एक दूसरा ढंग भी है: होशपूर्वक जीना और तब न उत्तर है, न प्रश्न है... 

प्रबुद्ध चेतना के पास कोई उत्तर नहीं है। इसका सौंदर्य यही है कि इसके पास कोई प्रश्न नहीं है। इसके सभी प्रश्न समाप्त हो चुके हैं, तिरोहित हो चुके हैं। लोग दूसरी तरह से सोचते हैं: वे सोचते हैं कि प्रबुद्ध व्यक्ति के पास हर बात का उत्तर होना चाहिए। और वास्तविकता यह है कि उसके पास कोई भी उत्तर नहीं है। उसके पास कोई प्रश्न ही नहीं है। बिना प्रश्नों के उसके पास कोई उत्तर कैसे हो?
एक महान कवयित्री, गरट्रूड स्टीन, अपने मित्रों से घिरी हुई मर रही थी कि अचानक उसने अपनी आंखें खोलीं और कहा, 'क्या है उत्तर?' किसी ने कहा, "लेकिन हमें प्रश्न ही पता नहीं है, तो हम उत्तर कैसे जान सकते हैं?" आखिरी बार उसने अपनी आंखें खोलीं और कहा, "ठीक है, तो प्रश्न क्या है?" और वह मर गई। एक अनोखा आखिरी वक्तव्य।
कवियों, चित्रकारों, नर्तकों और गायकों के अंतिम वचन हासिल कर पाना अति सौंदर्यपूर्ण होता है। उन वचनों में कुछ अत्यंत सार्थक समाहित होता है।
पहले उसने पूछा, "क्या है उत्तर?'...जैसे कि विभिन्न मनुष्यों के लिए प्रश्न भिन्न नहीं हो सकते। प्रश्न वही होने चाहिए; इसे कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। और वह जल्दी में थी, इसलिए उचित रास्ते से जाने के बजाय--प्रश्न पूछना और फिर उसके उत्तर सुनना-उसने इतना ही पूछा, "क्या है उत्तर?'
लेकिन लोग नहीं समझते कि हर व्यक्ति उसी स्थिति में है: वही प्रश्न सभी का प्रश्न है। इसलिए कोई मूर्ख व्यक्ति पूछ सकता है कि, "लेकिन यदि हम प्रश्न ही नहीं जानते तो हम उत्तर कैसे दे सकते हैं?'
यह तर्कपूर्ण लगता है, लेकिन ऐसा है नहीं, यह मात्र मूर्खतापूर्ण है और वह भी एक मरते हुए व्यक्ति से। लेकिन उस बेचारी महिला ने एक बार फिर अपनी आंखें खोलीं। उसने कहा, "ठीक है, क्या है प्रश्न?' और फिर वहां सन्नाटा हो गया।
कोई "प्रश्न' नहीं जानता, कोई "उत्तर' नहीं जानता। वास्तव में न तो कोई प्रश्न है, और न ही कोई उत्तर है; विचारों में जीना, भ्रांतियों में जीने का एक ढंग है। तब लाखों प्रश्न हैं और लाखों उत्तर, और प्रत्येक प्रश्न फिर और सैकड़ों प्रश्न ले आता है, और इसका कोई अंत नहीं है। लेकिन जीने का एक दूसरा ढंग भी है: होशपूर्वक जीना और तब न उत्तर है, न प्रश्न है। जब गरट्रूड स्टीन मर रही थी, यदि मैं वहां मौजूद होता, मैं उससे कहता, "यह क्षण प्रश्न और उत्तर के लिए परेशान होने का नहीं है। याद रखो, न कोई प्रश्न है और न कोई उत्तर: अस्तित्व प्रश्न और उत्तर के विषय में पूर्णतया मौन है। यह कोई दर्शन-शास्त्र की कक्षा नहीं है। बिना किसी प्रश्न के, और बिना किसी उत्तर के मृत्यु में उतर जाओ; बस चुपचाप, होशपूर्वक, शांतिपूर्वक मृत्यु में उतर जाओ।"
(सौज‍न्य से : ओशो न्यूज लेटर)

काशी सत्संग: देने वाला कौन!

October 16, 2018 0
काशी सत्संग: देने वाला कौन!

एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला।
लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई, तो साधु ने कहा, “प्रभु ने बताया है कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष है और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पांच बोरी अनाज है। इसी लिए प्रभु तुम्हें थोड़ा अनाज ही देते हैं, ताकि तुम 60 वर्ष तक जीवित रह सको।”
समय बीता। एक दिन फिर साधु की मुलाकात उस लकड़हारे से हुई। इस बार लकड़हारे ने कहा- “ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो, तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुंचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।”अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढेर सारा अनाज पहुंच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया है। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।
लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
कुछ दिन बाद साधु फिर लकड़हारे से मिलें, तो लकड़हारे ने कहा, “ऋषिवर!आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पांच बोरी अनाज है, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पांच बोरी अनाज आ जाता है।”
साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”
कथासार, हम किसी को कुछ दे रहे हैं, तो वह हमारा सामर्थ नहीं है, बल्कि परमात्मा ने मनुष्य को निमित्त मात्र बनाया है। ताकि मनुष्य के जरिए सभी प्राणियों की जरूरत पूरी कर सके।
दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप॥
ऊं तत्सत...

परम निधि की खोज!

October 15, 2018 0
परम निधि की खोज!
व्यक्ति अपने आदर्श जिन ऊंचाइयों या निचाइयों पर रखता है, उतनी ही ऊर्ध्वगामी या अधोगामी उसकी जीवनधारा हो जाती है और श्वास-प्रश्वास में स्मृति उसी ओर दौड़ती रहती है...

आदर्श को चुनने में कभी कंजूसी मत करना। वह तो ऊंचे से ऊंचा होना चाहिए। वस्तुत: तो परमात्मा से नीचे जो है, वह आदर्श ही नहीं है। आदर्श उसकी भविष्यवाणी है, जो कि अंतत: तुम करके दिखा दोगे। वह तुम्हारे स्वरूप की परम अभिव्यक्ति की घोषणा है।
सुबह से सांझ तक बहुत लोग मेरे पास आते हैं। उनसे मैं पूछता हूं कि तुम्हारे प्राण कहां हैं? एकाएक वे समझ नहीं पाते। फिर, मैं उनसे कहता हूं कि प्रत्येक प्राण उसके जीवन दर्शन में होते हैं, वह जो होना चाहता है, जो पाना चाहता है, उसमें ही उसके प्राण होते हैं। और जो कुछ भी नहीं होना चाहता है, कुछ भी नहीं पाना चाहता है, वही निष्प्राण है। यह हमारे हाथों में है कि हम अपने प्राण कहां रखें। जो जितनी ऊंचाइयों या निचाइयों पर उन्हें रखता है, उतनी ही ऊ‌र्ध्वगामी या अधोगामी उसकी जीवनधारा हो जाती है और श्वास-प्रश्वास में स्मृति उसी ओर दौड़ती रहती है। और, स्मृति जिस दिशा में दौड़ती है, क्रमश: विचार उसी पथ पर बीजारोपित होने लगते हैं। विचार आचार के बीज हैं। आज जो विचार हैं, कल वे ही अनुकूल अवसर पाकर अंकुरित हो, आचार बन जाते हैं। इसलिए जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है- अपने प्राणों को रखने के लिए सम्यक स्थल चुनना। जो इस चुनाव के बिना चलते हैं, वे उन नावों की भांति हैं, जो सागर में छोड़ दी गई हैं, लेकिन जिन्हें गंतव्य को कोई बोध नहीं। ऐसी नावें निकलने के पहले ही डूबी समझनी चाहिए। जो अविवेक और प्रमाद में बहते रहते हैं, उनके प्राण उनकी दैहिक वासनाओं में ही केंद्रित हो जाते हैं। ऐसे मनुष्य, शरीर के ऊपर और किसी सत्य से परिचित नहीं हो पाते। वे उस परम निधि से वंचित रह जाते हैं, जोकि उनके भीतर छिपी हुई थी।
अविवेक और प्रमाद से जागकर आंखें खोलो और उन हिमाच्छादित जीवन शिखरों को देखो, जो कि सूर्य के प्रकाश में चमक रहे हैं और तुम्हें अपनी ओर बुला रहे हैं। यदि तुम अपने हृदय में उन तक पहुंचने की आकांक्षा को जन्म दे सको, तो वे जरा भी दूर नहीं हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

काशी सत्संग: सच्चा धर्म

October 15, 2018 0
काशी सत्संग: सच्चा धर्म

एक गांव में एक लक्ष्मीनारायण का मंदिर था और उसके बगल में शिवालय था। इन मंदिरों के बाहर एक वृद्धा फूल बेचती थी। एक दिन वृद्धा के पास फूल कम पड़ गए। तभी वहां एक शिवभक्त आया और फूल मांगने लगा।
उसी समय एक नारायण भक्त ने भी फूलों की मांग की। वह वृद्धा बोली- मैं फूल किसे दूं। मेरे पास दोनों को देने लायक फूल तो हैं नहीं। इस पर शिवभक्त बोला- तुम मुझे फूल दो। भगवान महादेव को फूलों की अधिक जरूरत है। यह सुनकर नारायण भक्त बोला- ऐसा नहीं हो सकता। फूल मुझे चाहिए।
महादेव का क्या है, फूल नहीं है, तो भभूत ही मल दें। यह सुनकर शिवभक्त नाराज हो गया और बोला- अरे मूर्ख, शंकर तो जरा-सा नाम-जाप से ही प्रसन्न हो जाते हैं, पर तुम्हारे नारायण तो उम्र बीतने पर भी भक्त की बात नहीं सुनते। नारायण भक्त चिल्ला पड़ा।
क्या बढ़-चढ़कर बातें करता है? नंग-मलंग, गले में सांप, सारे शरीर पर भभूत, आसपास भूतों का डेरा, यह भी कोई भगवान हैं? इस प्रकार दोनों परस्पर शैव व वैष्णव मत की निंदा करने लगे। तभी एक तीसरा व्यक्ति वृद्धा से फूल लेकर चला गया। उस दिन गांव में महामंडलेश्वर धर्माचार्यजी आए हुए थे, जो शिवालय के दर्शन कर लक्ष्मीनारायण मंदिर की ओर जा रहे थे। उन्होंने दोनों से कहा- मैं शिवालय से आ रहा हूं और अब नारायण मंदिर में जा रहा हूं। तुम दोनों भी मेरे साथ आओ। जहां सच्चा धर्म होता है, वहां झगड़े नहीं होते हैं।
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: सफलता और समर्पण

October 14, 2018 0
काशी सत्संग: सफलता और समर्पण

मशहूर चित्रकार पिकासो एक दिन रास्ते से गुजर रहे थे, तभी एक महिला की नजर उन पर पड़ी। महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ती हुई उनके पास आई और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक हूं और आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद है। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनाएंगे।

पिकासो हंसते हुए बोले, 'मैं यहां खाली हाथ हूं। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!' लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिए, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊंगी या नहीं।'

पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उस पर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनाई और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और चुपचाप आगे बढ़ गई। महिला के मन में चल रहा था कि पिकासो उसको बेवकूफ बना रहे हैं। इसकी परीक्षा के लिए आगे बढ़कर बाजार पहुंची और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आई और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।' पिकासो ने हंसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।' महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिए और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिए। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूं, मुझे ऐसा बना दीजिए।'

पिकासो ने हंसते हुए कहा- 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनाई है। इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं!! तुम भी दो, सीख जाओगी..!!' वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गई!!
ऊं तत्सत...

फिजूल की दौड़ जिंदगी...

October 13, 2018 0
फिजूल की दौड़ जिंदगी...
जिंदगी में सब कुछ पाने के लिए दौड़ रहे हैं। यह जाने बिना, समझे बिना की पाना क्या है और यहीं से जीवन सिर्फ मनोरंजन बनकर रह गया है। अब उत्सव घटित नहीं होता, क्योंकि...

पूरी जिंदगी में वह क्षण नहीं आता, जब विराम हो, विश्राम हो, उत्सव हो। वह हो नहीं सकता। इन काम करने वाले लोगों ने सारी दुनिया को "मैड हाउस' बना दिया है, बिलकुल पागलखाना कर दिया है। और एक-एक आदमी पागल हो गया है। सब दौड़े जा रहे हैं कि कहीं पहुंचना है, यह मत पूछो...मैंने सुना है एक आदमी के बाबत कि वह तेजी से टैक्सी में सवार हुआ और उसने कहा, जल्दी चलो। टैक्सी वाले ने जल्दी टैक्सी चला दी। थोड़ी देर बाद उसने पूछा, लेकिन चलना कहां है? उसने कहा, यह सवाल नहीं है, सवाल जल्दी चलने का है। हम सब जिंदगी में ऐसे ही सवार हैं। जल्दी चलो। कहां जा रहे हैं आप? सब चिल्ला रहे हैं, "हरी अप'। लेकिन कहां? जोर से करो जो भी कर रहे हो। लेकिन क्यों? क्या होगा इसका फल? क्या पाने की इच्छा है? उसका कुछ पता नहीं। लेकिन इतना समय भी नहीं कि इसको सोचें। इतने में देरी हो जाएगी, पड़ोसी आगे निकल जाएगा। हम सब भागे जा रहे हैं। काम करने वाले लोगों ने, ये अति कामवादी, जिनको दिखाई पड़ता है कि काम ही सब कुछ है, उन्होंने भारी नुकसान पहुंचाए हैं। एक नुकसान तो इन्होंने पहुंचाया है कि जिंदगी से उत्सव के क्षण छीन लिए हैं। दुनिया में उत्सव कम होते जा रहे हैं। रोज कम होते जा रहे हैं। उत्सव की जगह मनोरंजन आता जा रहा है, जो कि बहुत भिन्न बात है। उत्सव की जगह मनोरंजन आ रहा है, जो बिलकुल भिन्न बात है। उत्सव में स्वयं सम्मिलित होना पड़ता है, मनोरंजन में दूसरे को सिर्फ देखना पड़ता है। मनोरंजन "पैसिव' है, उत्सव बहुत "एक्टिव' है। उत्सव का मतलब है, हम नाच रहे हैं। मनोरंजन का मतलब है, कोई नाच रहा है, हमने चार आने दिए और देख रहे हैं। लेकिन कहां नाचने का आनंद और कहां नाच देखने का आनंद। इतना काम हमने कर लिया है कि शाम थक जाते हैं, तो किसी को नाचते हुए देखना चाहते हैं।
■ ओशो

काशी सत्संग: सत्संग की शक्ति

October 13, 2018 0
काशी सत्संग: सत्संग की शक्ति

एक बार मुनि वशिष्ठ विश्वामित्र ऋषि के आश्रम में गए। उनका बड़ा स्वागत, सत्कार और आतिथ्य किया गया। कुछ दिन आदरपूर्वक रहने के बाद जब वशिष्ठ चलने लगे, तो विश्वामित्र ने उन्हें एक हजार वर्ष की अपनी तपस्या का पुण्यफल उपहार स्वरूप दिया। बहुत दिन बाद संयोगवश विश्वामित्र भी वशिष्ठ के आश्रम में पहुंचे। उनका भी वैसा ही स्वागत-सत्कार हुआ। जब विश्वामित्र चलने लगे, तो मुनि वशिष्ठ ने उन्हें अपने एक दिन के सत्संग का पुण्यफल भेंट किया।
विश्वामित्र मन ही मन बहुत खिन्न हुए। वशिष्ठ को एक हजार वर्ष की तपस्या का पुण्य भेंट किया था। वैसा ही मूल्यवान उपहार न देकर वशिष्ठ जी ने केवल एक दिन के सत्संग का तुच्छ फल दिया। इसका कारण उनकी अनुदारता और मेरे प्रति तुच्छता की भावना का होना ही हो सकता है। यह दोनों ही बातें अनुचित हैं।

मुनि वशिष्ठ विश्वामित्र के मनोभाव को समझ गए और उनका समाधान करने के लिए विश्वामित्र को साथ लेकर विश्व भ्रमण के लिए चल पड़े। चलते-चलते दोनों वहां पहुंचे जहां शेष जी अपने फन पर पृथ्वी का बोझ लादे हुए बैठे थे। दोनों ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया और उनके समीप ठहर गए।

अब वशिष्ठ ने शेष जी से पूछा-भगवन् एक हजार वर्ष का तप अधिक मूल्यवान है या एक दिन का सत्संग? शेष जी ने कहा- इसका समाधान केवल वाणी से करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव से करना ही ठीक होगा। मैं सिर पर पृथ्वी का इतना भार लिए बैठा हूं। जिसके पास तप बल है वह थोड़ी देर के लिए इस बोझ को अपने ऊपर ले लें। विश्वामित्र को तप बल पर गर्व था। उन्होंने एक हजार वर्ष की तपस्या के बल को एकत्रित करके उससे पृथ्वी का बोझ अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया, पर वह जरा भी नहीं उठी। अब वशिष्ठ को कहा गया कि वे एक दिन के सत्संग बल से पृथ्वी उठाएं। वशिष्ठ ने प्रयत्न किया और पृथ्वी को आसानी से अपने ऊपर उठा लिया।

शेष जी ने कहा- ‘तप बल की महत्ता बहुत है। सारा विश्व उसी की शक्ति से गतिमान है। परंतु उसकी प्रेरणा और प्रगति का स्त्रोत सत्संग ही है। इसी लिए उसकी महत्ता तप से भी बड़ी है।’ इस तरह विश्वमित्र की शंका का समाधान हो गया कि मुनि वशिष्ठ ने उन्हें तुच्छ उपहार भेंट कर उनका अपमान नहीँ किया है, क्योंकि सत्संग से ही तप की प्रेरणा मिलती है। अतः सत्संग को अधिक प्रशंसनीय माना गया है।
ऊं तत्सत...

“प्रेम न चिन्है कोई”

October 12, 2018 0
“प्रेम न चिन्है कोई”
लाख करो उपाय, प्रेम के लिए परिभाषा छोटी पड़ जाती है। व्याख्या में भी नहीँ समाता। बड़े-बड़े हार गए, सदियां बीत गईं, प्रेम के संबंध में कितनी बातें कही गईं और प्रेम के संबंध में एक भी बात कही नहीं जा सकी है...

मस्तिष्क का काम है रहस्य को रहस्य न रहने दे, उसे सुस्पष्ट परिभाषा में बांध ले। मगर कुछ चीजें हैं, जो परिभाषा में बंधती नहीं। प्रेम परिभाषा में बंधता नहीं। लाख करो उपाय, परिभाषा छोटी पड़ जाती है। व्याख्या में समाता नहीं। बड़े-बड़े हार गए, सदियां बीत गईं, प्रेम के संबंध में कितनी बातें कही गईं और प्रेम के संबंध में एक भी बात कही नहीं जा सकी है। जो कहा गया, सब ओछा पड़ा। जो कहा गया, सब थोथा सिद्ध हुआ। प्रेम इतना बड़ा है, इतना विराट है कि यह आकाश भी छोटा है।
प्रेम के आकाश से यह आकाश छोटा है। ऐसे कितने ही आकाश उसमें समा जाएं। महावीर ने इस आकाश को अनंत कहा है, और आत्मा के आकाश को अनंतानंत। अगर अनंत को अनंत से गुणा कर दें। असंभव बात। क्योंकि अनंत का अर्थ ही हो गया कि उसकी कोई सीमा नहीं, अब उसका गुणा कैसे करोगे? कोई आंकड़ा नहीं। लेकिन महावीर ने कहा, अगर यह हो सके कि अनंत को हम अनंत से गुणा कर सकें, तो अनंतानंत, तो हमारे भीतर के आकाश की थोड़ी सी रूपरेखा स्पष्ट होगी।
लेकिन मन हर चीज को समझ कर, जान कर स्पष्ट कर लेना चाहता है। क्यों? मस्तिष्क की यह आकांक्षा क्यों है? यह इसलिए कि जो स्पष्ट हो जाता है, मस्तिष्क उसका मालिक हो जाता है। जो राज राज नहीं रह जाते, मस्तिष्क उनका उपयोग करने लगता है साधन की तरह। लेकिन कुछ राज हैं, जो राज ही हैं और राज ही रहेंगे। मस्तिष्क उन पर कभी मालकियत नहीं कर सकता और उनका कभी साधन की तरह उपयोग नहीं हो सकता। वे परम साध्य हैं। सभी साधन उनके लिए हैं। प्रेम जिस तरफ इशारा करता है, वह इशारा परमात्मा की तरफ है। प्रेम का तीर जिस तरफ चलता है, वह परमात्मा है।
प्रेम का लक्ष्य सदा परमात्मा है। इसी लिए तुम जिससे भी प्रेम करो, उसमें तुम्हें परमात्मा की झलक अनुभूत होने लगेगी। इसी लिए तो प्रेमियों को लोग पागल कहते हैं। मजनू को लोग पागल कहते हैं; क्योंकि उसे लैला परमात्मा मालूम होती है। शीरीं को लोग पागल कहते हैं, क्योंकि फरहाद उसे परमात्मा मालूम होता है। पागल न कहें तो क्या कहें? एक साधारणसी स्त्री, एक साधारण सा पुरुष परमात्मा कैसे? लेकिन उन्हें प्रेम के रहस्य का कुछ अनुभव नहीं है। प्रेम की जहां भी छाया पड़ती है, वहीं परमात्मा का आविष्कार हो जाता है। प्रेम भरी आंख से फूल को देखोगे, तो फूल परमात्मा है। और प्रेम भरी आंख से कांटे को देखोगे, तो कांटा भी परमात्मा है। प्रेम की आंख जहां पड़ी, वहीं परमात्मा उघड़ आता है।
■ ओशो

काशी सत्संग: विपत्ति से भागो मत

October 12, 2018 0
काशी सत्संग: विपत्ति से भागो मत

अपने गुरु स्वामी राम कृष्ण परमहंस के शरीर त्याग के उपरांत स्वामी विवेकानंद तीर्थयात्रा पर निकले। कई स्थानों के दर्शन करते हुए वे काशी पहुंचे और विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गए। दर्शन कर जब वे मंदिर से बाहर आए, तो देखा कि मंदिर के सामने कुछ बंदर इधर-उधर चक्कर लगा रहे हैं।

उन दिनों स्वामी जी लंबा अंगरखा पहनते थे और सर पर साफा बांधते थे। वे विद्याप्रेमी थे, इसलिए उनकी जेबों में पुस्तक और कागज भरे रहते थे। भरी हुई जेबों को देखकर बंदरों को भ्रम हुआ कि उसमें खाने की वस्तु है और वे उनके पीछे पड़ गए।

अपने पीछे बंदरों को आते देख स्वामी जी भयभीत हो गए और तेज-तेज चलने लगे। बंदरों ने भी अपनी गति बढ़ा दी, जिससे स्वामी जी का भय बढ़ गया और उन्होंने दौड़ना प्रारंभ कर दिया। लेकिन बंदर भी उनके पीछे दौड़ने लगे। स्वामी जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें? बंदर उनका पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे। भय के कारण वे पसीने से नहा गए। वहां उपस्थित लोगों में से कोई भी उनकी सहायता के लिए सामने नहीं आया। सब तमाशबीन बन तमाशा देखते रहे।

तभी भीड़ में से ही स्वामी जी को एक आवाज सुनाई पड़ी, “भागो मत।” ज्यों ही ये शब्द स्वामी जी के कानों में पड़े, वे रूक गए। उन्हें बोध हुआ कि विपत्ति से डरकर जब हम भागते हैं, तो वह और तेजी से हमारा पीछा करती है। अगर साहस से उनका मुकाबला किया जाए, तो वह मुंह छुपाकर भाग जाती है।

फिर क्या था? वे मुड़े और निर्भीकता से खड़े हो गए। उन्हें देख बंदर भी खड़े हो गए। थोड़ी देर खड़े रहने के बाद वे सभी बंदर वापस लौट गए। उस दिन स्वामी जी के जीवन में एक नया मोड़ आया। उसके बाद समाज की बुराइयों को देख वे कतराए नहीं और हौसले के साथ उनका सामना किया।
ऊं तत्सत...

ग्यानै कारन कर अभ्यासु...

October 11, 2018 0
ग्यानै कारन कर अभ्यासु...
आसन, ध्यान, समाधि सब सीढ़ियां हैं। सीढ़ियों पर ही मत भटक जाना। सीढ़ियां कितनी ही सुंदर हों, लेकिन तुम्हारा लक्ष्य तो मंदिर में प्रवेश करना है, क्योंकि मंदिर का मालिक भीतर विराजमान है...

ग्यानै कारन कर अभ्यासु, ग्यानै भया तहं करमैं नासू।।
योग, ध्यान, तप-सारा अभ्यास, परमात्मा को जान लेने के लिए, उनका अनुभव हो जाए, इसलिए है। इन्हीं में मत उलझ जाना। नहीं तो कुछ लोग जिंदगी इसी में लगा देते हैं कि वे आसन ही साध रहे हैं। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं, जो जिंदगी भर से आसन ही साध रहे हैं। भूल ही गए कि आसन अपने आप में व्यर्थ है। ध्यान कब साधोगे? और ध्यान भी अपने आप में काफी नहीं है, समाधि कब साधोगे? और समाधि भी अपने आप में काफी नहीं है। ये सब साधन ही साधन हैं, सीढ़ियां हैं। सीढ़ियों पर मत अटक जाना। सीढ़ियां बहुत प्यारी भी हो सकती हैं, स्वर्ण-मंडित भी हो सकती हैं, उनका भी अपना सुख हो सकता है। लेकिन ध्यान रखना कि सीढ़ियां मंदिर की हैं, प्रवेश मंदिर में करना है। मंदिर का राजा, मंदिर का मालिक भीतर विराजमान है।
सब अभ्यास करो, लेकिन एक ध्यान रहे सब अभ्यास साधन मात्र हैं। ध्यान हो, पूजा हो, आराधना हो, सब अभ्यास हैं और साधन हैं। एक न एक दिन इन्हें छोड़ देना है। कहीं ऐसा न हो कि अभ्यास करते-करते अभ्यास में ही जकड़ जाओ!
ऐसी ही अड़चन हो जाती है। लोग पकड़ लेते हैं फिर अभ्यास को। फिर वे कहते हैं, तीस वर्षों से साधा है, ऐसे कैसे छोड़ दें? तो फिर साधन ही साध्य हो गया। फिर तुम अंधे हो गए। फिर तुम रेलगाड़ी में बैठ गए और यह भूल ही गए कि कहां उतरना है।
मुल्ला नसरुद्दीन सफर कर रहा था। टिकट कलेक्टर ने उससे टिकट पूछा। यह जेब देखी उसने वह जेब देखी, बिस्तर खोला, सूटकेस खोला, सारी चीजें फैला दीं। कलेक्टर भी चिंतित हो गया। उसने कहा रहने दीजिए आप, भले आदमी मालूम होते हैं। जरूर होगी टिकट। उसने कहा कि ऐसी की तैसी टिकट की। तुम्हारे लिए कौन टिकट खोज रहा है!उसने कहा फिर तुम किसके लिए खोज रहे हो? उसने कहा मैं इसलिए खोज रहा हूं कि मुझे जाना कहां है! जाना कहां है, यह याद रखना। कहीं ऐसा न हो कि ट्रेन में ही बैठे रहो, याद भी भूल जाए कि कहां जाना है।
रैदास ठीक कहते हैं: ग्यानै कारन कर अभ्यासु
अभ्यास तो करना- ध्यान का करो, प्रेम का करो, भक्ति का करो, लेकिन स्मरण रहे, लक्ष्य परमात्मा है। इसी में मत अटक जाना!
ग्यान भया तहं करमैं नासू।।
और जैसे ही ज्ञान हो जाएगा, वैसे ही सारा अभ्यास, सारे साधन, सारे कर्म खो जाएंगे। फिर क्या जरूरत रह जाएगी।
■ ओशो

काशी सत्संग: मन ही ईश्वर

October 11, 2018 0
काशी सत्संग: मन ही ईश्वर

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताते हुए उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। इसके निराकरण के लिए उन्होंने देवताओं की बैठक बुलाई और उनके सामने यह बात रखी।
प्रभु के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले, आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा, यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले, आप अंतरिक्ष में चले जाइए।
भगवान ने कहा, एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह  मन  ही मन सोचने लगे, “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं। अंत में सूर्य देव बोले, प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहां आपको कदापि तलाश न करेगा।
ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, मठ, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है, पर वे मिल नहीं रहे हैं। किंतु, मनुष्य कभी भी अपने भीतर- 'हृदय रूपी मन्दिर' में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता।
ऊं तत्सत...

जीवन एक कहानी है!!

October 10, 2018 0
जीवन एक कहानी है!!
जिसे हम जीवन समझते हैं, वह जीवन नहीं, केवल एक सपना है। नींद टूटने पर ज्ञात होता है कि हाथ में कुछ भी नहीं है- जो था वह था नहीं, बस! केवल दिखता था। पर, इस स्वप्न-जीवन से सत्य-जीवन में जागा जा सकता है। निद्रा छोड़ी जा सकती है...

जीवन- जिसे हम जीवन समझते हैं, वह क्या है? रात्रि कोई पूछता था। मैंने एक कहानी कही :- एक विश्रामालय में दो व्यक्ति आराम-कुर्सियों पर बैठे हुए थे। एक युवा था, एक वृद्ध था। जो वृद्ध था वह आंखें बंद किए बैठा था, पर बीच-बीच में मुस्करा उठता था। और कभी-कभी हाथ से और चेहरे से ऐसे इशारे करता था, जैसे कुछ दूर हटा रहा हो। युवक से बिना पूछे न रहा गया। वृद्ध ने एक बार आंखें खोली, तो उसने पूछ ही लिया, 'इस अत्यंत कुरूप विश्रामगृह में ऐसा क्या है, जो आप में मुस्कराहट ला देता है?' वृद्ध बोला, 'मैं अपने से कुछ कहानियां कह रहा हूं, उनमें ही हंसी आ जाती है।' उस युवक ने पूछा, 'और बार-बार हाथ से हटाते क्या हैं?' वृद्ध हंसने लगा और बोला, 'उन कहानियों को जिन्हें बहुत बार सुन चुका हूं।' युवक ने कहा, 'आप भी क्या कहानियों से मन समझा रहे हैं।' उत्तर में वृद्ध ने कहा था, 'बेटे, एक दिन समझोगे कि पूरा ही जीवन कहानियों से अपने को समझा लेने का नाम है।'
निश्चित ही जीवन जैसा मिलता है, वह कहानी ही है। और कहानियों से अपने को समझा लेने का ही नाम जीवन है। जिसे हम जीवन समझते हैं, वह जीवन नहीं, केवल एक सपना है। नींद टूटने पर ज्ञात होता है कि हाथ में कुछ भी नहीं है- जो था, वह था नहीं, बस, केवल दिखता था। पर, इस स्वप्न-जीवन से सत्य-जीवन में जागा जा सकता है। निद्रा छोड़ी जा सकती है। जो सो रहा है, वह जाग भी सकता है। उसके सो सकने की संभावना ही, उसके जागने की भी संभावना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)